कविता

साहित्य

एक दिन चुपचाप, अपने आप यानी बिन बुलाए, तुम चले आए; मुझे ऐसा लगा जैसे जगा था रात भर इसकी प्रतीक्षा में; कि दोनों हाथ फैलाकर तुम्हें उल्लास से खींचा; सबेरे की किरन...

बचाकर रखे हैं कुछ रंग, चींटियों के पंख, पंखों की मज़बूती

बचाकर रखे हैं कुछ रंग बचाकर रखा है होठों का गुलाबी रंग उन वैधव्यता वाले गालों के लिए जिनके पति लिपटे हुए लौटते हैं तिरंगे में बचाकर रखा है बालों...

स्थायी पता

स्थायी पते से दूर अनजान शहर में जब हम ढूँढते हैं कोई अस्थायी पता किराए के किसी कमरे में ख़र्च कर रहे होते हैं जब अपना वर्तमान और जुटा रहे...

युद्ध पर पुनर्विचार

यह हज़ारों साल पुराना दुःख है लाखों साल पुराना घाव, यह इतिहास का सबसे काला पन्ना है जिसे छूने पर ख़ून का चिपचिपा उँगलियों से चिपक जाता है यह दुनिया के...

अश्रु और स्वेद के नामक में है फ़र्क़

प्रिय मिलन की उत्कण्ठा में दौड़कर पहाड़ लाँघ गयी थी प्रिया, आपादमस्तक स्वेद से सनी हुई जब प्रियतम के गले लगी तब स्वेद की नैसर्गिक गन्ध से सुवासित हो...

ये डायनें

पितृसत्ता को पोषित करती औरतों ने जाना ही नहीं कि उनके शब्दकोष में 'बहनापा' जैसा भी कोई शब्द है जिसे विस्तार देना चाहिए छठ, जियुतिया करती माँएँ हर बेटी...

शिकार के बखत चाची

आ गयी चाची, साड़ी सरियाती, निहाल, निश्चिन्त। अपमान के ज़हर के दो घूँट पिए तो क्या हुआ? अब वहाँ क्या मालूम, बाथरूम मिलता कि नहीं मिलता। चाची...

भीड़-भाड़ में

भीड़-भाड़ में चलना क्या? कुछ हटके-हटके चलो! वह भी क्या प्रस्थान कि जिसकी अपनी जगह न हो हो न ज़रूरत बेहद जिसकी, कोई वजह न हो, एक-दूसरे को...

आइसोलेशन में प्रेमिकाएँ

पेड़, नदी, पहाड़ और झरने प्रेमिकाएँ उन सबसे लेती हैं उधार एक-एक कटोरी प्रीत और करघे की खच-खच में बहाती हुई अपनी निर्झरिणी वे बुन डालती हैं एक ख़ूबसूरत कालीन जिसमें मौजूद...

भूख से नहीं तो प्रतीक्षा से मरो

आसमान की ओर तकती निगाहें रोटी माँगती हैं मगर किससे? छत माँगती हैं मगर किससे? हक़ माँगती हैं मगर किससे? सुलेमानी ज़ायक़े वाला अकबरी फ़रमान जारी होता है, वायरस से नहीं तो भूख से मरो भूख...

नितेश व्यास की कविताएँ

बाँझ चीख़ें उनकी बाँझ चीख़ें लटक रही हैं आज भी उस पेड़ से जहाँ बो दिया था तुमने स्वयं को इस निर्मम धरती और निर्दय आकाश के बीच कहीं। नम सलवटें धूप ही आती है न बादल ही बरसते...

संक्रमण-काल

1 आज हर देश का शव नितान्त अकेला है हर देश का जीवित-भय एक है एक है धरती एक है आकाश एक है पानी का रंग एक ही स्वाद है आँसू का एक है...

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