रोटियाँ ग़रीब की, प्रार्थना बनी रहीं!

एक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर का
पर उसे भी आसरा आँसुओं के नीर का
राज है ग़रीब का, ताज दानवीर का
तख़्त भी पलट गया. कामना गई नहीं!
रोटियाँ ग़रीब की, प्रार्थना बनी रहीं!

चूमकर जिन्हें सदा क्रान्तियाँ गुज़र गईं
गोद में लिए जिन्हें आँधियाँ बिखर गईं
पूछता ग़रीब वह, रोटियाँ किधर गई?
देश भी तो बँट गया, वेदना बँटी नहीं!
रोटियाँ ग़रीब की, प्रार्थना बनी रहीं!

Book by Gopal Singh Nepali: