चुप क्यों हो संगी?
कुछ तो कहो!
पैरों के नीचे धरती के अन्दर
कोयले के अन्तस में छुपी
आग के बावजूद
इतनी ठण्डी क्यों है तुम्हारी देह?

झारखण्ड की
विशाल पट्टिकाओं में रेंगते
ताम्बे के तार
क्या तुम्हारी रगों में नहीं दौड़ते?
लोहे की धरती का पानी
पीने के बावजूद
हवा के एक झोंके में उड़ जाते हो!
आसाम-भोटांग, ईंट-भट्ठा
और महानगर
थर्मल पावर के दूधिया प्रकाश
और
जादूगोड़ा के जादुई चिराग़ तले
करंज तेल की ढिबरी लिए
मन के किस अन्धेरे में
भटक रहे हो संगी?

जल, जंगल, ज़मीन के बिना
साल-वन के जीवन का व्याकरण
किन पण्डितों के हाथों
तुमने गिरवी रखा है संगी?
कोटरों से निकल अपने
साल-वन के सुग्गे भी
पूछ रहे हैं
अपने होने का पता…
तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा में
संगी
अब भी खड़ी हूँ मैं
चट्टान में खड़े,
इकलौते साल-वृक्ष की तरह
जो चुपचाप सींच लेता है
अपने हिस्से का पानी।

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ग्रेस कुजूर
(जन्म: 3 अप्रैल 1949) 1980 के दशक की विशिष्ट कवयित्री। लेखन में आदिवासी सरोकारों के लिए उल्लेखनीय।