तीसरे पहर के बाद का अनुराग
अक्सर अपनी बाकी उम्र जीने के लिए,
फिर मिलता है..

हथेलियों की मेहंदी की खुरचन
जब वो नदी में घोलती है
तब किनारों को सुधी मिलती है,
एक दूसरे की..

सुनो.. पीले पड़े वादों का अलाव न जला देना
सर्दियाँ हैं, पिताम्बर समझ कुछ देर समेट लेना इनमें
अपने आप को..

गाँव का सबसे बुजुर्ग, शव यात्राओं में घाटों से निर्भयता लेने जाता है
मृत्यु से पहले ही कई बार मृत्यु जीकर आता है…

हरे पेड़ों को काटकर तुम जो यात्राएं खत्म करते हो,
जमीन फिर अपने सीने में उसका घाव लिए अपने ही अन्दर
धंस जाती है..

उन घावों में भर जाते हैं, दरख्तों के आंसू सूखकर
और क्षमा, शाप को भूल
बस एक अंकुर की बाट
जोहते हैं..

उनकी लकड़ियों से सजी लाइब्रेरी में गलियारे के छोर पर
मैैं रस्ता रोक लूंगी अबकी तुम्हारा..

तुम्हारी झुकी हुई नजरों को घूरते हुए, किताबें बिखेर दूंगी वहीं जमीन पर
उन्हें उठाने के बहाने गुलाब किसी जिल्द में फिर छुपाओ,
उससे पहले छीन लूंगी उसे तुमसे…

झपट लूंगी तुम्हारे हाथों से तुम्हारी डायरी
जिनके दो जिल्दों के बीच सैकड़ों पन्नों पर महकते शब्दों की उर्जा को
मुझे बिना बताए
बाँध रखे थे तुम..

जवाब अबकी भी सवालों के इंतजार में ठिठुरकर कर कठुआए पड़े रहेंगे
इन सर्दियों में..

खुशबूओं का रंग गर्मियों में झुलस कर काला नहीं सुर्ख पड़ जाता है,
जिनकी स्याही बना कर प्रेम की कहानियां लिखी जाती हैं!!

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