मैंने कब माँगा था तुमसे
आकाश का बादल
धरती का कोना
सागर की लहर
हवा का झोंका
सिंहासन की धूल
पुरखों की राख
या अपने बच्चे के लिए दूध

यह सब वर्जित है
मेरे देश में
हाँ साहिब, मेरा देश आपके देश से
अलग है
शायद एकदम अलग
यहाँ सूरज नींद बघारता है
रात जगाने को रिरियाती है
यहाँ कोई पेड़ नहीं जिस पर फल आए
जो है उसमें लकड़ी नहीं जो आग पकड़े
बस उनसे चिंगारी ही निकलती है
जो जंगल जला सकती है पर रोटी नहीं पका सकती

यहाँ मज़दूरी एक नागरिकता है
और पलायन है इस नागरिकता का
एक मजबूर आधार,
इसके संविधान के पन्ने
ख़ून और पसीने के बने हैं, जिन पर सीमेंट से लिखा गया है
यहाँ कर्तव्य और अधिकार के बीच जो नदी गुज़रती है
उसमें मेरे सपनों का मवाद सड़ता है
और इसका मरहम जिस टापू पर मिलेगा
वह देवालय के ठीक विपरीत खोजने को बोला गया है

मैं एकदम अनपढ़ हूँ साहिब, कुछ समझ नहीं पाता
नहीं याद मुझे
कि पिछली बार बाबू जी को पैसे कब भेजे थे
नहीं पता कि माँ की रूखी आवाज़ में दिखी भूख की उम्र क्या होगी
बीवी के बालों में लगाए फूल का रंग कौन-सा था
बच्चों को किए हुए वादों में कौन-सा वादा सबसे बड़ा झूठ था
बस यही देख पाता हूँ
जिस रथ पर वह राजा मुखौटा लगाए दौड़ा चला आ रहा है
उसमें मेरे पुरखे जुते हुए हैं
उनकी अंतड़िया नाल बन राजा के हाथ में हैं
और जिनको जगाने के लिए, तेज़ाब छिड़का जा रहा है

ख़ैर साहिब, आप मत सुनो इस देश की कथाएँ
कुछ कथाएँ समय की आँख का मोतियाबिंद हैं
जिनका इतिहास और भविष्य सदैव धुँधला ही रहा है
मैं बस इतना समझ गया हूँ
कि दिन को उबालकर याद नहीं मिटती
और रात को फाड़कर भूख नहीं जमती
आप बस जब इस बार घर जाना, तो अपने घर की ईटों को ज़ोर से थपथपाना
यही आवाज़ मेरे देश का राष्ट्रगीत होगी
जिसको मैंने नहीं लिखा, न ही पढ़ा, पर हाँ जिया ज़रूर है
और यही मेरे लिए वो सब होगा,
जिसे मैंने कभी ना माँगा था।

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वेदान्त दरबारी
कवि दिल से.....

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