प्रेम

‘Prem’, a poem by Sanyogita Mishra

गुनगुनी सुनहली धूप में,
नारंगी चिनार की छाँव में
बेंच पर बैठें हो हम तीनों
तुम, मैं और ख़ामोशी
जब ख़्वाहिशें हलक तक आकर रुकने लगें
जब ज़ुबान लड़खड़ाने लगे
बातें नज़रों से झाँकने लगें
जब ख़ामोशी ज़रा सी खटकने लगे
तब…
मैं तुम्हारी पीठ पर अपनी उंगलियों से
उकेर दूँगी कुछ ख़्वाब अपने
आयत की तरह, तुम पढ़ लेना उन्हें
हर्फ़-हर्फ़ साँसों में गढ़ लेना
समा लेना लफ़्ज़ों को ज़ेहन में
जैसे जल समाहित होता है मृदा में
अंतर्मन में प्रेम की नई कोपलें महकेंगी
तब…
तुम मुड़कर
मुस्कुराकर कहना – ‘क्या…’
मैं कहूँगी – ‘यूँही…’
ख़ामोशी, हल्की सी कोहनी मार
दबे पाँव चली जाएगी!
मैं…
सर को झुकाकर
कँगना घुमा दूँगी
यूँही…