प्रेम का इज़हार

‘Prem Ka Izhaar’, a poem by Kavita Singh

कोई स्त्री जब पुरुष का प्रेम स्वीकार करे
तो वो बड़ी बात हो या न हो,
मगर कोई स्त्री जब स्वयं पुरुष से
अपने प्रेम का इज़हार करे
तो ये बड़ी बात होती है…

क्योंकि…

ऐसी स्त्रियाँ कही जाती हैं
तेज़, निर्लज्ज, मुँहफट,
समझा जाता है उन्हें
बेशर्म और ग़लत

मगर वो सही या ग़लत की
परवाह नहीं करतीं,
वो अपने ऊपर उठी हर उंगली के
सामने खड़ी हो जाती हैं मज़बूती से

वो तोड़ देती हैं उस प्रचलन को
कि जिसमें प्रेमी चुनने का अधिकार
सिर्फ़ पुरुष का ही हो

वो तोड़ देती हैं उस रिवाज को भी
कि जिसमें प्रेम के इज़हार की कश्मकश
झेलनी पड़ती हो सिर्फ़ पुरुष को ही

साथ ही वो तोड़ देती हैं उस परम्परा को भी
कि जिसमें पुरुष को दब जाना होता था
ज़िम्मेदारियों के बोझ से

अब स्त्रियाँ सिर्फ़ प्रेम नहीं करतीं,
ज़िम्मेदारियाँ भी बाँट लेती हैं,
और अपने ख़र्चे भी खुद उठा लेने का माद्दा रखती हैं!!