प्रेम कवि

‘Prem Kavi’, a poem by Pratima Singh

सुबह-सुबह
वक़्त के ज़ख़्मी कंधों पर बैठे
उस कवि को
सबने कोसा
जो लिख रहा था पत्र
अपनी प्रेमिका को,
जंग पर जाते सिपाही ने उसके सामने फेंकी
बेकार कारतूसें और लाल रक्तभेदी निगाहें,
अख़बारों पर शहीद होते
पत्रकार ने शब्दों से ज़लील किया,
खेत की ओर जाते किसान ने
कीचड़ में सने पाँव उसके पन्ने पर रख दिए,
क्रांतिकारी एक युवक ने
बीच वाली उँगली हवा में दिखायी

अब शाम होने को थी,
स्कूल से लौटते बच्चों ने उसे
कौतूहल से देखा,
पेड़ की शाखें,
घर लौटते जानवरों की आँखें,
सभी जोशीले पाँव,
शांत थे अब

सिपाही ने लौटकर सबसे पहले
पत्नी की चूड़ियाँ चूमीं,
जोशीले पत्रकार ने
बारहवीं का अप्रेषित प्रेमपत्र
ऊँचे स्वरों में ख़ुद को सुनाया,
किसान के आँसू यूँ ही ढुलक
आए
उनींदे बच्चे की जम्हाई पर,
क्रांतिकारी युवक लाल झण्डे के पीछे रखी
माँ की तस्वीर पर झूम गया

प्रेमगीत लिखता कवि अब भी वहीं था,
उसने काग़ज़ पर वक़्त के हाथों लिखा था-
‘मेरी प्रेयसी,
सिर्फ़ प्रेम भविष्य है,
बाक़ी सब अनर्गल प्रलाप’।

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