प्रेमचंद के उद्धरण | Premchand Quotes in Hindi

‘प्रेमचंद की प्रेम-लीला का उत्तर’ से 

 

“अभी ज़िन्दा रहा तो कुछ लिखूँगा और मेरे भाषा और विचारों में उच्चकोटि के लेखकों जैसी बहुत-सी बातें आवेंगी। आप जो अच्छी पुस्तक देखेंगे, वह मेरी किसी पुस्तक से मिलती-जुलती जान पड़ेगी, कारण यही है कि मैं अपने प्लॉट जीवन से लेता हूँ, पुस्तकों से नहीं और जीवन सारे संसार में एक है। समकालीनता में भी सादृश्यता होती है, इससे कोई लेखक अपने को नहीं बचा सकता, अगर वह केवल जासूसी और तिलस्मी बातें नहीं लिखता। जो राजनैतिक भाव आज रूस में दिलों को विकल कर रहे हैं, वही भाव आज भारत के हृदय में स्पन्दन कर रहे हैं। कैसे सम्भव है कि हृदय रखने वाले दो लेखकों के विचार और भाव आपस में न मिलें।”

 

“मुझे ख़ुद उपन्यास-सम्राट कहलाना पसन्द नहीं। मैं क़सम खा सकता हूँ कि मैंने इस उपाधि की कभी अभिलाषा नहीं की। यदि ‘साहित्य-पाठक’ महोदय किसी तरह मुझे इस विपत्ति से बचा दें, तो उनका एहसान मानूँगा।”

 

‘रंगभूमि’ से

 

“धर्म-परायणता को सहिष्णुता से बैर है।”

 

“भूले-भटकों को प्रेम ही सन्मार्ग पर लाता है।”

 

‘मानसरोवर, भाग 1, प्राक्कथन’ से 

 

“मनुष्य ने जगत् में जो कुछ सत्य और सुन्दर पाया है और पा रहा है, उसी को साहित्य कहते हैं।”

 

‘कायाकल्प’ से

 

“तक़दीर पेट पर सबसे ज़्यादा चमकती है।”

 

‘सेवासदन’ से

“शिक्षा का कम से कम इतना प्रभाव तो होना चाहिए कि धार्मिक विषयों में हम मूर्खों की प्रसन्नता को प्रधान न समझें।”

‘साहित्य का आधार’ से

 

“साहित्य का सम्बन्ध बुद्धि से उतना नहीं, जितना भावों से है। बुद्धि के लिए दर्शन है, विज्ञान है, नीति है। भावों के लिए कविता है, उपन्यास है, गद्यकाव्य है।”

 

“चोर को प्रकाश से अंधेरा कहीं अधिक प्रिय है। इससे प्रकाश की श्रेष्ठता में कोई बाधा नहीं पड़ती।”

 

“जिसके प्रेम की परिधि जितनी ही विस्तृत है, उसका जीवन उतना ही महान् है।”

 

“साहित्यकार तो वही हो सकता है जो दुनिया के सुख-दुःख से सुखी या दुःखी हो सके और दूसरों में सुख या दुःख पैदा कर सके।”

 

“स्वयं दुःख अनुभव कर लेना काफ़ी नहीं है। कलाकार में उसे प्रकट करने का सामर्थ्य होना चाहिए।”

 

“अगर हम किसानों में रहते हैं या हमें उनके साथ रहने के अवसर मिले हैं, तो स्वभावतः हम उनके सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझने लगते हैं और उससे इसी मात्रा में प्रभावित होते हैं जितनी हमारे भावों में गहराई है। इसी तरह अन्य परिस्थितियों को भी समझना चाहिए। अगर इसका अर्थ यह लगाया जाए कि अमुक प्राणी किसानों का या मज़दूरों का या किसी आंदोलन का प्रोपेगेंडा करता है, तो यह अन्याय है। साहित्य और प्रोपेगेंडा में क्या अंतर है, इसे यहाँ प्रकट कर देना ज़रूरी मालूम होता है। प्रोपेगेंडा में अगर आत्म-विज्ञापन न भी हो तो एक विशेष उद्देश्य को पूरा करने की वह उत्सुकता होती है जो साधनों की परवाह नहीं करती। साहित्य, शीतल, मंद समीर है, जो सभी को शीतल और आनंदित करती है। प्रोपेगेंडा आंधी है, जो आँखों में धूल झोंकती है, हरे-भरे वृक्षों को उखाड़-उखाड़ फेंकती है और झोंपड़े तथा महल दोनों को ही हिला देती है। वह रस-विहीन होने के कारण आनंद की वस्तु नहीं। लेकिन यदि कोई चतुर कलाकार उसमें सौंदर्य और रस भर सके, तो वह प्रोपेगेंडा की चीज़ न होकर सद्साहित्य की वस्तु बन जाती है।”

 

“हम इसलिए किसी कलाकार से जवाब तलब नहीं कर सकते कि वह अमुक प्रसंग से ही क्यों अनुराग रखता है। यह उसकी रुचि या परिस्थितियों से पैदा हुई परवशता है। हमारे लिए तो उसकी परीक्षा की एक कसौटी है—वह हमें सत्य और सुंदर के समीप ले जाता है या नहीं? यदि ले जाता है तो वह साहित्य है, नहीं ले जाता तो प्रोपेगेंडा या उससे भी निकृष्ट है।”

 

“लेखक का एक-एक शब्द दर्शन में डूबा हो, एक-एक वाक्य में विचार भरे हों, लेकिन उसे हम उस वक़्त तक एक सद्साहित्य नहीं कह सकते, जब तक उसमें रस का स्रोत न बहता हो, उसमें भावों का उत्कर्ष न हो, वह हमें सत्य की ओर न ले जाता हो, अर्थात… बाह्य प्रकृति से हमारा मेल न करता हो।”

 

“साहित्य जहाँ रसों से पृथक् हुआ, वहीं वह साहित्य के पद से गिर जाता है और प्रोपेगेंडा के क्षेत्र में जा पहुँचता है।”

 

“एक ऐसा लेखक जो विश्व-बंधुत्व की दुहाई देता हो, पर तुच्छ स्वार्थ के लिए लड़ने पर कमर कस लेता हो, कभी अपने ऊँचे आदर्श की सत्यता से हमें प्रभावित नहीं कर सकता। उसकी रचना में तो विश्व-बंधुत्व की गंध आते ही हम ऊब जाते हैं, हमें उसमें कृत्रिमता की गंध आती है और पाठक सब कुछ क्षमा कर सकता है, लेखक में बनावट या दिखावा या प्रशंसा की लालसा को क्षमा नहीं कर सकता।”

 

“साहित्य का आधार भावों का सौंदर्य है, इससे परे जो कुछ है, वह साहित्य नहीं कहा जा सकता।”

 

‘साहित्य में बुद्धिवाद’ से

 

“अगर साहित्य का जीवन में कोई उपयोग न हो तो वह व्यर्थ की चीज़ है।”

 

“कला और साहित्य बुद्धिवाद के लिए उपयुक्त ही नहीं। साहित्य तो भावुकता की वस्तु है, बुद्धिवाद की यहाँ इतनी ही ज़रूरत है कि भावुकता बेलगाम होकर दौड़ने न पाए।”

 

“मनुष्य में न केवल बुद्धि है, न केवल भावुकता—वह इन दोनों का सम्मिश्रण है—इसलिए आपके साहित्य में भी इन दोनों का सम्मिश्रण होना चाहिए।”

 

“आप जनता तक तभी पहुँच सकते हैं, जब आप उसके मनोभावों को स्पर्श कर सकें। आपके नाटक या कहानी में अगर भावुकता के लिए रस नहीं है, केवल मस्तिष्क के लिए सूखा बुद्धिवाद है, तो नाटककार और नटों के सिवा हॉल में कोई दर्शक न होगा।”

 

“साहित्य में जीवन-बल की क्षमता होनी चाहिए। यहाँ तक तो हम आपके साथ हैं, लेकिन बुद्धिवाद ही यह जीवनबल दे सकता है, मनोभावों द्वारा यह शक्ति मिल ही नहीं सकती, यह हम नहीं मानते। आदर्श साहित्य वही है जिसमें बुद्धि और मनोभाव दोनों का कलात्मक सम्मिश्रण हो।”

 

‘विषम समस्या’ से 

 

“समृद्धि के शत्रु सब होते हैं, छोटे ही नहीं, बड़े भी। हमारी ससुराल या ननिहाल दरिद्र हो तो हम उससे कोई आशा नहीं रखते। कदाचित् हम उसे भूल जाते हैं, किंतु वे सामर्थ्यवान होकर हमें न पूछें, हमारे यहाँ तीज और चौथ न भेजें तो हमारे कलेजे पर साँप लोटने लगता है।”

 

“इस काँइयाँपन से, जो दूसरों का गला दबाता है, वह भोलापन क्या बुरा था, जो दूसरों का अन्याय सह लेता था।”

‘लांछन’ से

“कौन है, जो अपने अतीत को किसी भयंकर जंतु के समान कटघरों में बंद करके न रखना चाहता हो।”

‘दिल की रानी’ से

“अमन का क़ानून जंग के क़ानून से जुदा है।”

“सल्तनत किसी आदमी की जायदाद नहीं बल्कि एक ऐसा दरख़्त है, जिसकी हरेक शाख और पत्ती एक-सी खुराक पाती है।”

‘नमक का दारोगा’ से

“मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखायी देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है।”

‘पंच परमेश्वर’ से

“क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?”

“हमारे सोये हुए धर्म-ज्ञान की सारी सम्पत्ति लुट जाए, तो उसे ख़बर नहीं होती, परन्तु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है।”

“अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा हमारे संकुचित व्यवहारों का सुधारक होता है। जब हम राह भूलकर भटकने लगते हैं तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय पथ-प्रदर्शक बन जाता है।”

‘बूढ़ी काकी’ से

“बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है।”

“संतोष-सेतु जब टूट जाता है तब इच्छा का बहाव अपरिमित हो जाता है।”

‘खुचड़’ से

“जीवन स्वाधीनता का नाम है, ग़ुलामी तो मौत है।”

‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’ से

 

“साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है।”

 

“वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड। और इसके जन्मदाता भी वही लोग हैं, जो साम्प्रदायिकता की शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं।”

 

“वह मुबारक दिन होगा, जब हमारे शालाओं में इतिहास उठा दिया जाएगा।”

 

“यह ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। यह आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके, जिससे यह अन्धविश्वास, यह धर्म के नाम पर किया गया पाखण्ड, यह नीति के नाम पर ग़रीबों को दुहने की कृपा मिटायी जा सके।”

 

“जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है, न ज़रूरत। ‘संस्कृति’ अमीरों का, पेटभरों का, बेफ़िक्रों का व्यसन है। दरिद्रों के लिए प्राण-रक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है।”

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प्रेमचंद
प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव, प्रेमचंद को नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी।

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