प्रेमचंद के उद्धरण | Premchand Quotes in Hindi

‘लांछन’ से-

“कौन है, जो अपने अतीत को किसी भयंकर जंतु के समान कटघरों में बंद करके न रखना चाहता हो।”

‘दिल की रानी’ से-

“अमन का क़ानून जंग के क़ानून से जुदा है।”

“सल्तनत किसी आदमी की जायदाद नहीं बल्कि एक ऐसा दरख़्त है, जिसकी हरेक शाख और पत्ती एक-सी खुराक पाती है।”

‘नमक का दारोगा’ से-

“मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखायी देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है।”

‘पंच परमेश्वर’ से-

“क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?”

“हमारे सोये हुए धर्म-ज्ञान की सारी सम्पत्ति लुट जाए, तो उसे ख़बर नहीं होती, परन्तु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है।”

“अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा हमारे संकुचित व्यवहारों का सुधारक होता है। जब हम राह भूलकर भटकने लगते हैं तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय पथ-प्रदर्शक बन जाता है।”

‘बूढ़ी काकी’ से

“बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है।”

“संतोष-सेतु जब टूट जाता है तब इच्छा का बहाव अपरिमित हो जाता है।”

‘खुचड़’ से

“जीवन स्वाधीनता का नाम है, ग़ुलामी तो मौत है।”

‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’ से

 

“साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है।”

 

“वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड। और इसके जन्मदाता भी वही लोग हैं, जो साम्प्रदायिकता की शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं।”

 

“वह मुबारक दिन होगा, जब हमारे शालाओं में इतिहास उठा दिया जाएगा।”

 

“यह ज़माना साम्प्रदायिक अभ्युदय का नहीं है। यह आर्थिक युग है और आज वही नीति सफल होगी जिससे जनता अपनी आर्थिक समस्याओं को हल कर सके, जिससे यह अन्धविश्वास, यह धर्म के नाम पर किया गया पाखण्ड, यह नीति के नाम पर ग़रीबों को दुहने की कृपा मिटायी जा सके।”

 

“जनता को आज संस्कृतियों की रक्षा करने का न अवकाश है, न ज़रूरत। ‘संस्कृति’ अमीरों का, पेटभरों का, बेफ़िक्रों का व्यसन है। दरिद्रों के लिए प्राण-रक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है।”

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प्रेमचंद
प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव, प्रेमचंद को नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी।