‘Premsikt October’, a poem by Mukesh Kumar Sinha

कुछ दिनों पहले ही तो
हमने मँगवाया था
ख़ुशियों भरा सितम्बर
पर, इस सितम्बर की गर्मी को धता बताकर
अब आने वाला है अक्टूबर
खिलखिलाकर!

कमर तक जयपुरी रजाई ओढ़े
रविवार की दोपहर
चला रखा था पंखा तीन पर
थोड़ा अधिक दूध और चाय पत्ती खौलाकर
बना रखी थी चाय, लेते हुए सिप
कुछ ठण्ड कुछ गर्मी की सरगर्मी में
‘कोई कहे मीठा कोई कहे नमकीन’ की टैग लाइन पर
“अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार” को
तकिये के नीचे दबाकर
सोच रहे थे
कैसी होगी मोहब्बत अगर
विधु माल्या का पांचवा होता
या छठा होता किसी सोनप्रिया पाणिग्रही का

होता होगा न प्यार
नम्बरों से इतर
जब उसके घुटनों से थोड़ा ऊपर
रखकर सर
अधरों को खोले उम्मीद में
और तभी चलते पंखे की तीनों पंखुड़ियों से
बरसने लगे गुलाबों की पत्तियाँ
फिर तो, सपनों में पत्तियाँ ओढ़े
मिट्टी की सौंधी गमक में
मिल जाएँ ऐसे जैसे ख़ुद को कहें
अंत में मिट्टी में ही मिलना है प्रिय!
खो जाओ आग़ोश में
सुहाने से मौसम को अनुभव कर

अजब सी हलकी ठंडक में
बढ़ चुके थे धूप के नखरे
ललछों प्रकाश के साथ
चोर सिपाही के खेल में जैसे
कर रही हो धप्पा!
मधुमालती के पुष्पों का गुच्छा
था चेहरे के साथ दुपट्टे के ऊपर छितरा हुआ
नीचे फ़र्श पर थे छितरे
रात की रानी के अनगिनत खिलखिलाते फूल
केसरिया और सफ़ेद रंग की बिछी थी चादर

शाम से हो चुकी थी रात
छोटे दिनों के बाद
होने वाला था लम्बी रात का आगाज़
लिहाफ़ को लिफ़ाफ़े की तरह तह कर
लिपटे हुए थे ऐसे
जैसे हो
प्रेम पत्र और उसमें बिखरी थी
अपराजिता की कुछ ताज़ी पंखुड़ियाँ!

फिर से भोर होगी
फिर से कनेर के पतले-पतले पत्तों की हरियाली में
चमकेंगे पीले फूल
फिर से रक्ताभ होंठ सदृश
कुछ लाल गुड़हल
और नींबू की सफ़ेद कलियों की ताजगी भरी सुगंध में
खोते हुए भी
कह दूँगा
प्यार और सोमवार नहीं होते हैं एक साथ!

अगले इतवार की उम्मीद के साथ
रखो विराम!

यह भी पढ़ें: ‘मुकेश कुमार सिन्हा’ की कविता ‘फ़ोबिया’

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