प्रेमसिक्त सफ़र

‘Premsikt Safar’, a poem by Mukesh Kumar Sinha

याद आ रहा आज वो पहला सफ़र
जब स्कूटर के पीछे बैठकर
कर रही थी नाख़ून से कलाकारी
और थी उम्मीद कि समझ पाऊँ
उन हिज्जों को कि शब्द क्या बोल रहे!

सफ़र के दरमियान आगे से आ रहा था
ट्रक, पर खोया था,
गुलाबी अहसासों के दबाव को
बिना बनियान के पहने बुशर्ट पर,
हॉर्न की तीव्रता बता रही थी मेरी ग़लती
पर स्पर्श की रूमानियत
मौत को धप्पा कहते हुए ट्रक के सामने से
कुलाँचे भरते हुए मुड़ी और फिर
टाटा बायबाय कहकर ट्रक को,
फिर से खो जाना चाह रही थी
उस चित्रकार के तूलिका के स्पर्श में
जो मेरे बुशर्ट को समझ बैठी थी
गुलाबी कैनवास!

सफ़र और शर्ट बदलते रहे
कभी-कभी बदल गए वाहन भी
पर नहीं बदली सड़क
न ही बदल पायी वो चित्रकार
और उसकी तूलिका ने हर बार
एक ही चित्र बनाया पीठ पर
हर बार सफ़र पर होने का अर्थ
हमने यही समझा कि
आज फिर से मोनालिसा
मुस्कुराएगी
आज फिर से पीठ पर
लिखा जाएगा प्रेम गीत

और क्या बताऊँ
कभी तो बिना वाहन के भी
उसने कहा चिट्ठियों के लिए है महफ़ूज़
ये पीठ
और क़लम के निब के नोक जैसे
उसके नाख़ून करते रहे
संवाद या बताते रहे
ग़ुस्से की बेवजह वाली वजह
कई बार सीखा बैलेंस बनाना
क्योंकि रीढ़ की हड्डियों को
रखना पढ़ता था स्थिर
ताकि नोट पैड पर निब के दबाव को समझूँ
और कहूँ धीरे से
आई अण्डरस्टुड, ध्यान रखूँगा न, आगे से!

उसी ने समझाया था कभी
प्रेम में अंधा हो जाना चाहिए
ताकि संवाद की लिपि बदले
ख़ैर, कुछ सेंस ऐसे ही जागृत हुए थे
फिर, ज़िन्दगी बीतती चली गई पर आज भी
उस ख़ास ब्रेल लिपि की सिहरन
महसूस लेता हूँ कभी-कभी!

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