खुली आँखों से देखे हुए सपने
मुझे रात में काटते हैं चिकोटियाँ
और गड़ाते हैं दाँत,
वे नहीं चाहते कि मैं उन्हें भूलूँ
मुझे नहीं पता मैं कब सोयी मुर्दा होकर आख़िरी बार,
मुझे बस इतना पता है कि
रात में मेरा सिर मटका हो जाता है
जिसे कोई ठोंकता रहता है बार-बार,
मैंने देखा है शून्य को मेरी छाती पर चढ़ते हुए
और अनन्त को लात मारते हुए,
मुझे लगता है मेरे हृदय के भीतर
एक शिशु का हाथ है
जो मारता रहता है पंजे बहत्तर बार हर मिनट
कई बार तो बहत्तर से भी ज़्यादा,
मेरा बिस्तर उन सभी पन्नों की चादर है
जिनमें लिखी है मैंने कविताएँ,
मुझे अपने ओढ़ने भर का भी लिखना है
सर्दी के लिए थोड़ा मोटा-मोटा
मेरे दिन मेरी रात के ही फलन हैं
मैं उनमें भला कैसे फ़र्क़ करूँ
जब पृथ्वी ने ही मुझे अधिकार दिया है
कि मैं उसपर बैठ कर लिखा करूँ चिट्ठियाँ
एक चिट्ठी में मैंने पूछा था कि बताओ
कब देखा है तुमने हँसते हुए पृथ्वी को आख़िरी बार
जवाब में मुझे कोई चिट्ठी न मिली
फिर मैंने एक और चिट्ठी लिखकर
पाट दी पृथ्वी की भुजा में
जब मैंने देखा उसे रोते हुए
बार-बार…