1

पृथ्वी!
एक बुढ़िया की
मटमैली-सी गठरी है

जो भरी हुई है
कौतूहल से
उम्मीद से
असमंजस से
प्रेम से।

जिसमें कुछ न कुछ खोजने के बाद भी
हर बार
बचा ही रह जाता है
कुछ न कुछ और।

2

माँ के चलने से ही
जारी रहती है घर की चाल
पृथ्वी के चलते रहने से
ठीक रहता है दुनिया का हाल

पृथ्वी एक माँ है और
माँ एक पृथ्वी
जिस रोज़ थक जाएगी माँ
और रुक जाएगी पृथ्वी—
उस रोज़ कौन बचेगा जो बता सके
कि पृथ्वी कभी माँ जितनी जवान थी
और माँ कभी पृथ्वी जितनी हरी।

3

पृथ्वी के पास
ख़ूब सारी कहानियाँ हैं
ख़ूब सारी पहेलियाँ
बुझाती है पृथ्वी
जीवन की साँझ में
जब बच्चे लौट आते हैं
पृथ्वी की गोद
तो ये कहानियाँ ही ढाँपती हैं उनके शरीर
और सितारों से चमकते हैं उनके चेहरे

थकान की रात उन्हें सीने से चिपका
पृथ्वी ही ले जाती है
नींद के जादू भरे देश।

4

पृथ्वी को कोई हक़ नहीं
उदास होने, रोने और
थकने का
भाग जाने का अपनी धुरी से दूर
ऐसा नहीं कि पृथ्वी ऐसा कर नहीं सकती
लेकिन एक इंच भी हिलने पर
जब चली जाती है कई-कई घरों की रौशनी
तब अंधेरे में पृथ्वी भी कलपती है
कुत्तों, बिल्लियों और सियारों के रुदन के साथ।

केदारनाथ सिंह की कविता 'यह पृथ्वी रहेगी'

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शिवम चौबे
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में परास्नातक। फिलहाल अध्ययनरत। कविताएँ लिखने पढ़ने में रूचि। संपर्क- [email protected]

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