‘Purush Saundarya’, a poem by Shweta Rai

चंदन वन सा महक रहे तुम, अरुण आभ लेकर तन में।
सुरभित करते सांसों को तुम, कस्तूरी लेकर मन में॥
आँखों में नभ की उज्ज्वलता, साहस की जो परछाई।
धनु पिनाक सी भौहें लगती, लोलित जिससे तरुणाई॥

मस्तक पर है ज्योति पुंज इक, भाव फूल की हैं घाटी।
कोण नासिका पर शोभित है, शील धैर्य की परिपाटी॥
अधर प्रिये मधु के दो प्याले, संचित जिसमे प्रेम लगे।
छू कपोल की अरुणाई को, जीवन में रसधार पगे॥

वक्ष लगे विंध्याचल जैसा, सिंधु शरण जिसमें पाये।
पौरुष की ये दीप्ति शिखा प्रिय, विचलित मन को है भाये॥
उर में बहती गंगा धारा, तेज बसा है वाणी में।
गुंजन देकर जो भौरों को, आग लगा दे पानी में॥

बाँहों में है शक्ति अश्व की, तोड़ सुमन पर कब पाये।
आलिंगन की चाह सदा ही, सम्मुख मेरे झुठलाये॥
तुम समीर के चंचल झोकें, घूम रहे निर्बन्ध यहाँ।
सत्य मगर तुम रुके वहां पर, फूलों का है बंध जहाँ॥

अंग अंग मधुमास लिए प्रिय, तुम सा कब सुंदर कोई।
जयी! सुनो अपना जीवन मैं, व्यर्थ स्वप्न में हूँ खोई॥
आज जगत ये प्यारा लगता, झूठे सारे गल्प लगे।
हम दोनों हैं प्रिय पूरक इक, ये जीवंत सा कल्प लगे॥

पुरुष प्रीत संकल्प लगे… ये जीवंत सा कल्प लगे…
पिया प्रिया दोनों हैं पूरक, ये जीवंत सा कल्प लगे…

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श्वेता राय
विज्ञान अध्यापिका | देवरिया, उत्तर प्रदेश | ईमेल- [email protected]

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