इस पेड़ में
कल जहाँ पत्तियाँ थीं
आज वहाँ फूल हैं,
जहाँ फूल थे
वहाँ फल हैं,
जहाँ फल थे
वहाँ संगीत के
तमाम निर्झर झर रहे हैं,
उन निर्झरों में
जहाँ शिलाखण्ड थे
वहाँ चाँद तारे हैं,
उन चाँद तारों में
जहाँ तुम थीं
वहाँ आज मैं हूँ
और मुझमें जहाँ अन्धेरा था
वहाँ अनन्त आलोक फैला हुआ है
लेकिन उस आलोक में
हर क्षण
उन पत्तियों को ही मैं खोज रहा हूँ
जहाँ से मैंने, तुम्हें पाना शुरू किया था!

Previous articleअन्तिम प्रेम
Next articleनौचंदी का मेला
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना मूलतः कवि एवं साहित्यकार थे, पर जब उन्होंने दिनमान का कार्यभार संभाला तब समकालीन पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को समझा और सामाजिक चेतना जगाने में अपना अनुकरणीय योगदान दिया। सर्वेश्वर मानते थे कि जिस देश के पास समृद्ध बाल साहित्य नहीं है, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं रह सकता।