प्यार तुम, अनुभूति तुम, आयाम बन कर क्या करोगे?
तुम हृदय के भाव हो, आवाज़ बन कर क्या करोगे?

ज़िन्दगी की तुम महक, तुम जीवन की लालसा हो
देह की सम्पूर्णता जब, भाग बन कर क्या करोगे?

स्वास में, उच्छ्वास में, विश्वास में हर स्वर तुम्हारा
बस गए हो जब लहू में, याद बन कर क्या करोगे?

दो मनों की धड़कनों के राग का अनुवाद हो तुम
रागिनी बन बह रहे हो शब्द बन कर क्या करोगे?

दर्द की लय पर रची मुस्कान हो मेरे अधर पर
साथ हो अनगिन जनम, उम्र बन कर क्या करोगे?

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Book by Dharmpal Mahendra Jain:

 

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धर्मपाल महेंद्र जैन
टोरंटो (कनाडा) जन्म : 1952, रानापुर, जिला – झाबुआ, म. प्र. शिक्षा : भौतिकी; हिन्दी एवं अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर प्रकाशन : पाँच सौ से अधिक कविताएँ व हास्य-व्यंग्य प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, आकाशवाणी से प्रसारित। ‘इस समय तक’ कविता संकलन व "दिमाग़ वालो सावधान" और “सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?” व्यंग्य संकलन प्रकाशित। संपादन : स्वदेश दैनिक (इन्दौर) में 1972 में संपादन मंडल में, 1976-1979 में शाश्वत धर्म मासिक में प्रबंध संपादक। संप्रति : सेवानिवृत्त, स्वतंत्र लेखन। दीपट्रांस में कार्यपालक। पूर्व में बैंक ऑफ इंडिया, न्यू यॉर्क में सहायक उपाध्यक्ष एवं उनकी कईं भारतीय शाखाओं में प्रबंधक। स्वयंसेवा : जैना, जैन सोसायटी ऑफ टोरंटो व कैनेडा की मिनिस्ट्री ऑफ करेक्शंस के तहत आय एफ सी में पूर्व निदेशक। न्यू यॉर्क में सेवाकाल के दौरान भारतीय कौंसलावास की राजभाषा समिति और परमानेंट मिशन ऑफ इंडिया की सांस्कृतिक समिति में सदस्य। तत्कालीन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकर्स में परीक्षक।