ताल में अचानक एक हलचल हुई। वहाँ के जलजीवों ने देखा एक नया मेहमान कछुआ। उसे सबने घेर लिया।

“भाई, तुम कौन? यहाँ कैसे और कहाँ से आए?”

“मैं चेतन कछुआ हूँ। तुम्हारे बीच कैसे और कहाँ से आया, यह जानने के लिए मेरी आपबीती सुनो… पर ज़रा दम तो लेने दो मुझे।”

कुछ रुककर कछुए ने कहना शुरू किया, “मैं यहाँ से बहुत दूर बाबा की बावड़ी में रहता था। अभी कुछ दिन पहले, एक लड़का आकर बावड़ी में झाँकने लगा। मैं पानी की सतह से लगी पायदान पर सुस्ता रहा था, उस लड़के ने मुझे पुकारा और कोई चीज़ मुझ पर फेंकी।

लड़के ही तो ठहरे। अकसर ऐसी शैतानी करते हैं। मैं घबराकर डुबकी मार गया। पर तुरंत बाद मुझे मालूम हुआ, उस लड़के ने कुछ खाने की चीज़ फेंकी थी। यही मेरी उस प्यारे दोस्त से पहली मुलाक़ात थी। उसी ने मेरा नाम चेतन रखा।

मेरा नाम ‘चेतन’ सुनकर तुम सबको हँसी आ रही है न? पर सचमुच ऐसा नाम पाकर मुझ जैसे सुस्त जीव में भी चेतना आ गयी। उसकी बातों से मुझे मालूम पड़ा, वह गाँव में नया आया था, कुछ ही दिन हुए—अपने नाना के यहाँ छुट्टियाँ बिताने।

‘हैलो चेतन, हैलो।’ वह बावड़ी की जगत पर खड़ा मुझे पुकारता।

मैं दौड़कर सीढ़ी पर आ जाता। वह नीचे आता। मुझे थपथपाकर कहता, ‘देखो, मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ—नानी के हाथ के बने ज्वार के पूए। तुम्हें पसंद है ना पृए?’

मैं ख़ामोश रहकर उससे कहता, “हाँ हाँ, पसंद है, बहत पसंद है…’

और कैसे कहता? हम दोनों के बीच ऐसे ही बातचीत होती। बबन बोल-बोलकर और मैं बस चुप रहकर, एक-दूसरे को सब कुछ बता देते। उसने बातों-बातों में मुझे बताया—शहर से उसके पापा आए थे और दो-तीन दिन में वह उनके साथ घर लौट जाएगा। अफ़सोस हुआ सुनकर बहुत।

उसी दिन शाम को उसने गाँव के एक लड़के जीतू से मेरा परिचय कराया। वह लड़का निरा शैतान निकला। पहली मुलाक़ात में ही पैर की ठोकर से उसने मेरा स्वागत किया। शायद बबन को यह बात अच्छी न लगी। वह उसे तुरंत बावड़ी से बाहर ले गया।

दूसरे दिन बावड़ी पर बबन की तरह किसी ने सीटी बजायी। मैं बाहर आया। मैं धोखा खा गया था। किसी ने मुझे पकड़कर कपड़े में बाँध लिया। ये हाथ मुझे प्यार से सहलाने वाले बबन के हाथ नहीं थे—मैं महसूस कर रहा था।

घबरा गया। हाथ-पाँव समेटकर चुपचाप पड़ा रहा। बाहर लाकर उसने मुझे ज़मीन पर पटक दिया और लगा ज़ोर-ज़ोर से अपने दोस्तों को पुकारने। मैंने, आवाज़ से पहचान लिया—यह जीतू था। उसके दोस्त दौड़े आए। मेरा निरीक्षण करने लगे।

मैंने ज़रा-सा सिर बाहर निकाला तो किसी ने लकड़ी चुभो दी। अब अपने अंग समेटे, सख़्त खोल में, दम साधे पड़े रहने में ही मेरी ख़ैर थी, पर उन लड़कों को चैन कहाँ। उनमें से कोई मेरी पीठ पर लकड़ी टकटका रहा था, कोई लात मारकर इधर-उधर उछाल रहा था, कोई उल्टा गिराकर मेरे मुलायम अंगों को तकलीफ़ पहुँचाता था। मैं पीड़ा से बेहाल हो गया।

तभी मैंने वह प्यारी आवाज़ सुनी—दोस्त की आवाज़, ‘अरे-अरे ये क्या कर रहे हो, तुम लोग?’

‘देखते नहीं? खेल रहे हैं—फ़ुटबाल, ऐसे ही खेलते हैं न?’

‘रुको। रुक जाओ। इस तरह तो चेतन मर जाएगा।’ बबन अधीर होकर बोला।

पर खेल नहीं रुका। पागलों के हाथ पलीता लग गया था जैसे।”

“फिर बबन ने क्या किया?” छोटी-सी एक मछली ने व्याकुल होकर पूछा।

कछुए ने कहा, “बबन ने तब तक एक दूसरा उपाय सोच लिया था— ‘तो जाओ, मैं तुम्हें अपने नये खिलौने नहीं दिखाऊँगा। पापा कल लाए हैं। दूर के इशारे से चलने वाली रिमोट कंट्रोल कार…’

सब एकदम रुक गए। हैरान होकर बोले, ‘सिर्फ़ इशारे से चलने वाली? यानी बिना चाबी के भी?’

‘हाँ’, बबन ने कहा, ‘तुम सबको दिखाऊँगा, पहले इस बेक़सूर बेज़ुबान को छोड़ दो।’

‘पर एक शर्त मेरी भी सुनो’, यह आवाज़ जीतू की थी, ‘इसे छोड़ने के बदले तुम मुझे अपनी चाबी से पटरी पर चलने वाली रेलगाड़ी दोगे। बोलो मंज़ूर है?’

‘ठीक है! चेतन को छोड़ दो।’ बबन ने शर्त मंज़ूर कर ली।

मेरा दिल रो उठा, बबन तूने यह क्या किया? मुझे बचाने के लिए अपना क़ीमती खिलौना तूने खो दिया।

जीतू मुझे उठाकर बावड़ी पर लाया, नीचे छोड़ आने के बजाय वहीं से बावड़ी में फेंकने का उसका इरादा मैंने भाँप लिया, मैंने उस दुष्ट को एक छोटी-सी सज़ा देना ज़रूरी समझा, मेरी रिहाई के बदले मेरे भोले दोस्त से वह बेहूदा सौदा कर रहा था, सो गिरने से पहले मैंने उसकी तीन उँगलियों को काट खाया।”

“ओह। यह तुमने अच्छा किया।” दूसरी मछली ने ख़ुशी ज़ाहिर की।

“आज सुबह जब पौ फटने वाली थी, मैंने बबन की सीटी सुनी और बाहर आया तो बबन की आवाज़, ‘दोस्त चल, वक़्त बहुत कम है, अब यहाँ तेरी जान को ख़तरा है। शहर जाने से पहले तुझे राम तलैया में छोड़ दूँ।’

मैं उससे कितनी ही बातें पूछना चाहता था, पर शायद उसके पास वक़्त कम था। उसने जल्दी से मुझे एक अंगोछे में लपेटा और बेतहाशा भागने लगा, क्या बताऊँ कितनी देर वह भागता रहा—मेरी ख़ातिर मीलों दूर भागा।

जब हम यहाँ पहुँचे, ख़ासा दिन निकल आया था। मुझे ताल के किनारे छोड़कर दोस्त बोला, ‘आज ही मैं जा रहा हूँ चेतन, तुम सुरक्षित हो, उस शैतान जीतू को यह ठिकाना मालूम न हो इसलिए यह काम हमें इस वक़्त करना पड़ा। ताल में जाओ दोस्त, मुझे भूल न जाना, अगली छुट्टी पर तुमसे यहीं मिलने आऊँगा। जाओ…अब जाओ।'”

सारी कहानी सुनकर छोटी मछली बोली, “ओह, कैसा प्यारा दोस्त है, बबन।”

“हाँ, मैं उसे दूर तक देखता रहा और फिर पानी में उतर आया…”

निधि अग्रवाल की कहानी 'भोलू और चंदू'

Book by Padma Chougaonkar:

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