मन आज भी कश्मकश में है
कि उम्र भर की क़ैद मोहब्बत है या आज़ादी
मुझे क़ैद चाहिए थी,
उसकी गिरफ़्त चाहिए थी,
मुझे चाहिए थीं उसकी नज़रें जो मुझपे निगरानी रखें,
मुझे चाहिए थीं उसकी उँगलियाँ जो मेरी उँगलियों से उलझकर
मुझे हथकड़ी लगाए रखें,
मुझे चाहिए था उसका हर वक़्त मेरी चौकसी में रहना,
मुझे चाहिए था उसका मेरी रिहाई की दलीलें सुनकर अनसुना करना,
जैसे कि वो मुझे आज़ाद करना ही ना चाहता हो
मुझे चाहिए था बन्धन जो मुझे बांधे रखता उम्र भर के लिए उससे,
मुझे चाहिए थी मोहब्बत के गुनाह में उम्र क़ैद की सज़ा…

पर उसने मुझे दी आज़ादी,
आज़ादी अपने सपनों को जीने की,
उसने मुझे दी हिम्मत बन्धन को तोड़ने की,
उसने मुझे दिए पंख उड़ान भरने के लिए,
उसने मुझे दिए अनोखे रंग ज़िन्दगी को सजाने के लिए,
उसने मुझे दी आज़ादी हर तरह की क़ैद से,
उसने ख़ुद तोड़ दी मेरी हथकड़ियाँ,
और मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया,
अपनी गिरफ़्त में रखने के बजाय,
मुझे ख़ुद से दूर कर दिया…

और फिर यही बात चुभती रही उम्र भर
मोहब्बत क्या है?
क़ैद या आज़ादी?