धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘गुनाहों का देवता‘ से उद्धरण | Quotes from ‘Gunahon Ka Devta’, a novel by Dharmvir Bharti

 

“सचमुच लगता है कि प्रयाग का नगर-देवता स्वर्ग-कुंजों से निर्वासित कोई मनमौज़ी कलाकार है जिसके सृजन में हर रंग के डोरे हैं।”

 

“कभी-कभी उदासी भी थक जाती है।”

 

“दर्द इंसान के यक़ीदे को और मज़बूत न कर दे, आदमी के क़दमों को और ताक़त न दे, आदमी के दिल को ऊँचाई न दे तो इंसान क्या?”

 

“हरेक आदमी ज़िन्दगी से समझौता कर लेता है किन्तु मैंने ज़िन्दगी से समर्पण कराकर उसके हथियार रख लिए हैं।”

 

“प्यार की प्रतिक्रिया भी प्यार की ही परिचायक है।”

 

“औरत अपने प्रति आने वाले प्यार और आकर्षण को समझने में चाहे एक बार भूल कर जाए, लेकिन वह अपने प्रति आने वाली उदासी और उपेक्षा को पहचानने में कभी भूल नहीं करती।”

 

“हिन्दू नारी इतनी असहाय होती है, उसे पति से, पुत्र से, सभी से इतना लांछन, अपमान और तिरस्कार मिलता है कि पूजा-पाठ न हो तो पशु बन जाए। पूजा-पाठ ने ही हिन्दू नारी का चरित्र इतना ऊँचा रखा है।”

 

“प्रेम एक तरह की बीमारी होती है, मानसिक बीमारी, जो मौसम बदलने के दिनों में होती है, मसलन क्वार-कार्तिक या फागुन-चैत। उसका सम्बन्ध रीढ़ की हड्डी से होता है और कविता एक तरह का सन्निपात होता है।”

 

“पुरुष हो या नारी, सभी के जीवन का एकमात्र सम्बल विश्वास है।”

 

“क्या पुरुष और नारी के सम्बन्ध का एक ही रास्ता है—प्रणय, विवाह और तृप्ति! पवित्रता, त्याग और दूरी क्या सम्बन्धों को, विश्वासों को ज़िन्दा नहीं रहने दे सकते?”

 

“नफ़रत से नफ़रत बढ़ती है, प्यार से प्यार जागता है।”

 

“मुझे सुख-रोग हो गया है! बहुत सुख में रहने से ऐसा ही हो जाता है।”

 

“जिस समय परीक्षकों के घर में पारिवारिक कलह हो, मन में अंतर्द्वंद हो या दिमाग़ में फ़ितूर हो, उस समय उन्हें कॉपियाँ जाँचने से अच्छा शरणस्थल नहीं मिलता। अपने जीवन की परीक्षा में फ़ेल हो जाने की खीझ उतारने के लिए लड़कों को फ़ेल करने के अलावा कोई अच्छा रास्ता ही नहीं है।”

 

“या तो प्यार आदमी को बादलों की ऊँचाई तक उठा ले जाता है, या स्वर्ग से पाताल में फेंक देता है। लेकिन कुछ प्राणी हैं जो न स्वर्ग के हैं न नरक के, वे दोनों लोकों के बीच में अन्धकार की परतों में भटकते रहते हैं। वे किसी को प्यार नहीं करते, छायाओं को पकड़ने का प्रयास करते हैं, या शायद प्यार करते हैं या निरन्तर नयी अनुभूतियों के पीछे दीवाने रहते हैं और प्यार बिल्कुल करते ही नहीं। उनको न दुःख होता है न सुख, उनकी दुनिया में केवल संशय, अस्थिरता और प्यास होती है…”

 

“मैं सोच रही हूँ अगर यह विवाह-संस्था हट जाए तो कितना अच्छा हो। पुरुष और नारी में मित्रता हो। बौद्धिक मित्रता और दिल की हमदर्दी। यह नहीं कि आदमी औरत को वासना की प्यास बुझाने का प्याला समझे और औरत आदमी को अपना मालिक। असल में बँधने के बाद ही, पता नहीं क्यों सम्बन्धों में विकृति आ जाती है। मैं तो देखती हूँ कि प्रणय विवाह भी होते हैं तो वह असफल हो जाते हैं क्योंकि विवाह के पहले आदमी औरत को ऊँची निगाह से देखता है, हमदर्दी और प्यार की चीज़ समझता है और विवाह के बाद सिर्फ़ वासना की। मैं तो प्रेम में भी विवाह-पक्ष में नहीं हूँ और प्रेम में भी वासना का विरोध करती हूँ।”

 

“माना किसी लड़की के जीवन में वासना ही तीखी है, तो क्या इसी से वह निन्दनीय है? क्या वासना स्वतः में निन्दनीय है? ग़लत! यह तो स्वभाव और व्यक्तित्व का अन्तर है, बिनती! हरेक से हम कल्पना नहीं माँग सकते, हरेक से वासना नहीं पा सकते। बादल है, उस पर किरण पड़ेगी, इन्द्रधनुष ही खिलेगा, फूल है, उस पर किरण पड़ेगी, तबस्सुम ही आएगा। बादल से हम माँगने लगें तबस्सुम और फूल से माँगने लगें इन्द्रधनुष, तो यह तो हमारी एक कवित्वमयी भूल होगी। माना एक लड़की के जीवन में प्यार आया, उसने अपने देवता के चरणों पर अपनी कल्पना चढ़ा दी। दूसरी के जीवन में प्यार आया, उसने चुम्बन, आलिंगन और गुदगुदी की बिजलियाँ दीं। एक बोली, ‘देवता मेरे! मेरा शरीर चाहे जिसका हो, मेरी पूजा-भावना, मेरी आत्मा तुम्हारी है और वह जन्म-जन्मान्तर तक तुम्हारी रहेगी…’ और दूसरी दीपशिखा-सी लहराकर बोली, ‘दुनिया कुछ कहे अब तो मेरा तन-मन तुम्हारा है। मैं तो बेक़ाबू हूँ! मैं करूँ क्या? मेरे तो अंग-अंग जैसे अलसाकर चूर हो गए हैं तुम्हारी गोद में गिर पड़ने के लिए, मेरी तरुणाई पुलक उठी है तुम्हारे आलिंगन में पिस जाने के लिए। मेरे लाज के बन्धन जैसे शिथिल हुए जाते हैं? मैं करूँ तो क्या करूँ? कैसा नशा पिला दिया है तुमने, मैं सब कुछ भूल गयी हूँ। तुम चाहे जिसे अपनी कल्पना दो, अपनी आत्मा दो, लेकिन एक बार अपने जलते हुए होठों में मेरे नरम गुलाबी होठ समेट लो न!’ बताओ बिनती, क्यों पहली की भावना ठीक है और दूसरी की प्यास ग़लत?”

राही मासूम रज़ा के उपन्यास 'टोपी शुक्ला' से उद्धरण

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