“सत्य सितारे होते हैं जिन्हें तुम केवल रात के अँधेरे में ही देख सकते हो।”


“सत्य सृष्टि की उन तमाम ख़ूबसूरत चीज़ों की तरह है, जो अपनी ख़ूबसूरती सिर्फ़ उन्हीं पर प्रकट करता है जो बदसूरती के भार को सह चुके हैं।”


“जो स्वर्ग के दर्शन इस दुनिया में नहीं करता है, वो यहाँ के बाद कहीं और नहीं करेगा।”


“यीशु नासरी ने हमको भेड़ियों के मध्य पेड़ बनाकर भेजा था, हम किन शिक्षाओं से भेड़ों के मध्य भेड़िये बन गए।”


“दुर्बलों, अपराधियों और वेश्याओं के हृदय में सांत्वना देने वाले शब्द देवालयों की प्रार्थनाओं से सब प्रकार से उत्तम हैं।”


“तूफ़ान और हिमपात फूलों को तो नष्ट कर सकते हैं, पर उनके बीजों को नहीं।”


“प्राणियों में उस भावना से पवित्र और मधुर शायद ही कोई अन्य भावना हो जो एक कुमारी के सूने हृदय को मधुर गीतों से गुंजरित कर उसके दिन कवि की कल्पना में और रात देवदूत के स्वप्न में बदल देती है।”


“क्या जीवन एक साथ ऋण और पूर्णता नहीं है? क्या हम अभाव और बहुलता के मध्य इस भाँति नहीं खड़े हैं जिस भाँति वृक्ष ग्रीष्म और शिशिर ऋतु के मध्य खड़े रहते हैं?!”


“अधिकारी पुरुष अपना भवन असहायों और निर्धनों की हड्डियों पर खड़ा करता है और धर्माचार्य अपना देवालय भक्तों और श्रद्धालुओं की समाधियों पर। शाषक खेतिहरों की कलाई पकड़ता है और पादरी अपना हाथ बढ़ाकर उनकी जेबें ख़ाली कर देता है। शाषक धरती के बेटों के बीच भौंए टेढ़ी कर विचरता है और पादरी… मुस्कुराता हुआ। चीते की ग़ुर्राहट और भेड़िये की मुस्कुराहट के बीच सर्वहारा वर्ग यों मिटता है।

शाषक क़ानून का आश्रय लेता है जबकि धर्माचार्य धर्म का और इन दोनों पाटों के बीच भव्य शरीरों का क्षय होता है और आत्माओं का पलायन।”


“मिट्टी की तह में दबे हृदय कभी विद्रोह नहीं करते, न मुर्दे कभी रोते हैं।”


“राष्ट्र अपनी अज्ञानता में अपने पवित्रतम पुत्रों को पकड़कर नृशंस अत्याचारी शाषकों के सुपुर्द कर देता है और उन लोगों को चिढ़ाता है, अपमानित करता है और यातना देता है जो इन पुत्रों पर सहानुभूति दिखलाते हैं। पर क्या एक सपूत अपनी माँ को बीमारी के समय त्याग देता है? या एक सहृदय भाई विपत्ति में पड़े अपने भाई को छोड़ देता है?”


“मैं तुमसे अपने ऊपर दया करने को नहीं कहता, पर न्याय करने को कहता हूँ। दया तो उस व्यक्ति पर की जाती है जिसने अपराध किया हो। निरपराध तो केवल न्याय चाहता है।”


साभार: किताब: नास्तिक | लेखक: खलील जिब्रान | प्रकाशन: संवाद प्रकाशन | अनुवाद: हृदयेश

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