विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ से उद्धरण | Quotes from ‘Naukar Ki Kameez’, a novel by Vinod Kumar Shukla

चयन एवं प्रस्तुति: पुनीत कुसुम

 

“घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है।”


“लौटने के लिए ख़ुद का घर ज़रूरी होता है, चाहे किराये का एक कमरा हो या एक कमरे में कई किरायेदार हों।”


“दृश्य बदलने के लिए पलक का झपक जाना ही बहुत होता है।”


“चेहरे में दो कान हैं इसकी याद बहुत दिनों तक नहीं रहती। कान चेहरे से कहाँ जाएँगे? इस तरह की लापरवाही सामाजिक सुरक्षा को बतलाती है। सब जगह अमन-चैन है, यह मालूम होता है।”


“हैसियत के अनुसार नीयत डोलने की सीमा निर्धारित होती है।”


“उपेक्षित उपस्थिति होने से आदमी को अदृश्य होने में समय नहीं लगता।”


“मेरी एक सीमा थी कि मेरी ग़ैरहाज़िरी में मेरा घर कैसा लगता होगा, यह मैं कभी नहीं देख सकता था। इसलिए जब कोई यह कहता कि आनेवाले बीस वर्षों में यह देश बहुत ख़ुशहाल हो जाएगा तब मैं सोचता था कि ख़ुशहाली बीस वर्षों में क्यों? बीस वर्षों के बाद भी ख़ुशहाली होगी, यह कैसे कोई कह सकता था? ख़ुशहाली अभी हो, इसी वक़्त; मेरे देखते-देखते!”


“समय कोई दूरी नहीं थी, जिसे धीरे चलकर बचाया जा सकता, या तेज़ चलकर जल्दी बिताया जा सकता। यह तो कुदाली चलाते भी बीतता था। बेकार हों तब भी बीतता।”


“आँखों से जो कुछ देखा जाता है, उसके साथ-साथ दुनिया का काम अनुभव से चलता है। अनुभव से ज़्यादा अन्दाज़ से, जिसमें ग़लतियाँ ही ग़लतियाँ होती हैं। अन्दाज़ से नहीं, होशियारी और चालाकी से भी दुनिया चलती है जिसमें ग़लतियों की सम्भावना कम होती है। इसमें ख़ुद का नुक़सान कम, दूसरों का नुक़सान अधिक होता है।”


“दुनिया में आग लगाने की माचिस सात समुद्र के नीचे है। और वह भीगकर सैकड़ों वर्ष पहले ख़राब हो चुकी है। वहाँ कोई नहीं पहुँच सकता। दुनिया को कोई बदल नहीं सकता। अगर तुम अकेले बदल जाओगे तो बुरी मौत मरोगे।”


“बहुत से लोग दुःख सहने का अभ्यास बचपन से करते हैं। इसके अभ्यास के लिए मैदान की ज़रूरत नहीं होती। घर के किसी कोने में पड़े-पड़े या दिन-भर खटते, पेट भरने की कोशिश में अभ्यास होता रहता है। मैं दुःख सहने का नगर स्तर या ज़िला स्तर का खिलाड़ी नहीं होना चाहता था। इससे कभी किसी का बाप नहीं जाना जाता। घर पर सारे अभ्यास और धैर्य टूट जाते थे क्योंकि मैं पत्नी को, माँ को, भाइयों को, दोस्तों को, सबको प्यार करता था। मैं दुःख को ख़त्म करने के प्रयास के लिए स्टेमिना चाहता था। एक अच्छा फ़ॉर्म पाना चाहता था। ज़िन्दा रहना और दुःख सहना, दोनों की शक्ल इतनी मिलती-जुलती थी जैसे जुड़वा हों।”


“संघर्ष का दायरा बहुत छोटा था। प्रहार दूर-दूर से और धीरे-धीरे होते थे इसलिए चोट बहुत ज़ोर की नहीं लगती थी। शोषण इतने मामूली तरीक़े से असर डालता था कि विद्रोह करने की किसी की इच्छा नहीं होती थी।”


“यदि एकबारगी कोई गर्दन काटने के लिए आए तो जान बचाने के लिए जी-जान से लड़ाई होती। इसलिए एकदम से गर्दन काटने कोई नहीं आता। पीढ़ियों से गर्दन धीरे-धीरे कटती है। इसलिए ख़ास तकलीफ़ नहीं होती और ग़रीबी पैदाइशी रहती है। गर्दन को हिलगाए हुए सब लोग अपना काम जारी रखते हैं—यानी गर्दन कटवाने का काम।”


“पहनने का ढंग या पहनावा आदमी के नक़्शे में शामिल हो जाता है जो मरते दम तक नहीं छूटता। पतलून-पायजामा पहननेवाला, पतलून-पायजामा पहने-पहने मरेगा। सूट पहनकर उसके मरने की उम्मीद नहीं की जा सकती। घुटने के ऊपर से मोटी धोती लपेटे रहनेवाला बढ़ई उसी को पहने-पहने मरेगा। अधनंगा अधनंगा ही मरेगा।”


“मैं नहीं चाहता था कि मेरी उपस्थिति वह अपनी वजह से जाने। जबकि मैं उसे अपनी उपस्थिति जतलाना चाहता था।”


“रात-भर जागकर ही आनेवाले दिन को पकड़ सकते थे। यदि सोते रहो तो लगता था कि दिन का पीछा नहीं कर रहे हैं, रास्ते में सो गए हैं। ऐसे में दूसरा दिन पकड़ में कहाँ आता था? परन्तु गले पड़ जाता था। नींद खुलते ही गले पड़ा हुआ दिन।”


“दृश्य में अनगिनत चीज़ें होती हैं, पर किसी कारण से मालूम होती हैं। वैसे नहीं।”


“जब वह मुझे बहुत प्यारी लगती थी तो इसका मतलब यह हुआ कि ऐसी मेरी इच्छा थी।”


“वैसे सरकार की आलोचना की गुंजाइश प्रजातन्त्र में हमेशा रहती थी। पर मैंने उसका उपयोग कभी नहीं किया।”


“जितनी बुराइयाँ हैं, वे केवल इसलिए कि कुछ बातें छुपायी नहीं जातीं और अच्छाइयाँ इसलिए हैं कि कुछ बातें छुपा ली जाती हैं।”


“मैं सोचने लगा कि मैं फँस गया। डाक्टर मेरा इलाज कर, मेरे शिष्टाचार और संकोच को आकार देकर मुझे बहुत निरीह और दयनीय आदमी बना देगा। मैं इतने बड़े डाक्टर के इलाज के लायक़ मरीज़ नहीं था।”


“महत्त्वपूर्ण बात ज़िन्दा आदमी की कलाई में बंधी बन्द घड़ी नहीं थी। मरे आदमी की कलाई में बंधी चलती घड़ी थी। मेरा मामला मुर्दे आदमी की चलती घड़ी का था।”


“बेईमानी के साथ-साथ धर्म के काम भी बढ़ते थे। क्योंकि बेईमानी की कमाई से धर्म-पुण्य का काम होता था।”


“ख़र्च पूरा न बैठने के कारण दया और उदारता कम हो जाती है, यह बात समझ में जल्दी आती थी। उदारता और दया का सीधा-साधा सम्बन्ध रुपए से है। सिर पर हाथ फिरा देना न तो उदारता होती है, न दया। बस सिर में हाथ फिराना होता है।”


“समान स्तर के आदमियों का सामान एक-जैसा होता था, जो आईना मेरे घर में था, वही आईना मास्टरजी के घर था। मेरी जैसी चारपाई उनके घर की भी थी। एक स्तर के आदमी जिस तरह खपते थे, सामान भी उसी तरह खप जाता था।”


“मोगरे का फूल पौधे में अच्छा लगता था, पर यदि वह पौधे में लगा-लगा मुरझा गया तो लगता था कि उसका उपयोग नहीं किया गया और उसका फूल बेकार चला गया। तोड़ लिया जाता तो कुछ उपयोग होता। पत्नी का रिश्ता फूल को तोड़कर अपने पास रख लेने का था। पेड़ में खिले फूल-जैसा रिश्ता कहीं नहीं दिखता था। यदि फूल पास में रखे-रखे मुरझा गया तो पौधे में भी फूल मुरझा जाता है, यह तर्क तैयार रहता था।”


“घर तो बिलकुल खुले पिंजड़े की तरह था, जिसमें रहने की आदत पड़ जाती है। चन्द्रमा आकाश से भागकर जाएगा कहाँ? आकाश से भागकर आकाश में रहेगा।”


“किसी दुःख के परिणाम से कोई ज़हर नहीं खा सकता। यह तो षड्यन्त्र होता है। आदमी को बुरी तरह हराने के बाद ज़हर का विकल्प सुझाया जाता है। आदमी को भूखा रखकर ज़हर खाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। भूखा रखना किसी को हराना नहीं था। यदि ऐसा होता तो हराने का काम आसान हो जाता।”


“बस इक्के-दुक्के मामलों को अपनी मर्ज़ी के अनुसार चलाकर वह घर की रानी थी। उसका व्यक्तिगत संसार बड़ा नहीं था। वहाँ एकांत नहीं था। हर जगह केवल मैं उपस्थित था। केवल दो आदमियों की दुनिया।”


“मुझे चन्द्रमा आकाश में गोल कटी हुई खिड़की की तरह लगता था जिससे आकाश की आड़ में छुपी हुई दुनिया का उजाला आता था। सूर्य का भी यही हाल था। फ़र्क़ सिर्फ़ दिन और रात का था।”


“हालत सुधारने के लिए अधिक-से-अधिक मेहनत करने के उपाय पर मुझे विश्वास नहीं था। कुदाली चलानेवाला मज़दूर दिन-रात कुदाली चलाकर भी अपनी हालत सुधार नहीं सकता था।”


“बाज़ार में मेहनत की कोई क़ीमत नहीं है। आदमी की अधिक-से-अधिक आमदनी और कम-से-कम आमदनी में भयानक अन्तर था। इसको देखकर दहशत होती थी। थके-हारे क़दम आगे बढ़ाने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी। एक क़दम आगे बढ़ाने से सीधे जान जाने का डर था। उस अन्तर के बीच तरह-तरह की क़िलेबन्दी की गई थी। इस कारण लोग ग़रीबों से अच्छा व्यवहार करने से भी कतराते थे। उनसे कहा जाए कि अमीर चोर हैं तो ग़रीब हँसने लगेंगे, कहेंगे, हमारे पास क्या रखा है, जो मिट्टी का घड़ा पहले था, अभी भी है। बल्कि हमीं चोर हैं, उनकी चीज़ों पर नीयत लगाए बैठे रहते हैं। जिनके पास कुछ नहीं होता, वे चोर होते हैं। जिनके पास सब कुछ होता है, वे दया करके भीख देते हैं, काम देते हैं, और बख़्शिश देते हैं।”


“जिस प्रकाश की झलक फटे हुए गोल छेद से, सूर्य और चन्द्रमा जानकर वे देखते हैं, उनसे कहा जाए कि सूर्य और चन्द्रमा की खिड़की से कूदकर चोर की तरह वहाँ जाने की बात सोचने के बदले यदि पूरे आकाश को फाड़ दिया जाए तो पूरे आकाश जितना बड़ा सूर्य होगा और चन्द्रमा होगा यह बात सोची जाए, तब वे कहेंगे—ऐसे ही रहने दो! सूर्य कभी-कभी हमारे लिए रोज़ी का दिन भी ले आता है। और चन्द्रमा कभी-कभी नींद की रात। कुछ उल्टा-सीधा हो गया तो हम मिलनेवाले काम के दिन और नींद की रात को भी खो बैठेंगे।”


“साहब को एक नौकर की ज़रूरत थी। नौकर की उन्हें कमी नहीं थी। पर बिना कमी के भी ज़रूरत होती रहती थी। जैसे बाई साहब के पास पचास साड़ियाँ हैं, तो इसका मतलब है कि उनके पास पचपन साड़ियाँ नहीं हैं। नम्बर से ज़रूरत का हिसाब पूरा नहीं होता। नम्बर से ज़रूरत का हिसाब कम पड़ता है। एक अच्छी चीज़ भी जो होती है, वह किसी एक से बढ़कर होती है और एक से बढ़कर एक चीज़ें ख़त्म नहीं होतीं।”


“एक अच्छा नौकर परिवार में नौकर की तरह शामिल रहता था। जैसे परिवार में कौन है? तो, पति-पत्नी, दो लड़के, एक लड़की और एक नौकर। यह आदर्श परिवार था।”


“इण्टरव्यू लेने की ज़रूरत नहीं है। नौकरों से पूछना कम चाहिए, बताना ज़्यादा चाहिए। बताने के बाद पूछताछ होनी चाहिए कि जो बताया गया था, वह ठीक से पूरा हुआ या नहीं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसे नौकर की कमीज़ फ़िट होगी, अगर इसे कमीज़ फ़िट नहीं हुई तो मैं इसे नौकर नहीं रखूँगा। इसके पास भी बेढंगे कपड़े हैं। सबके नाप की कमीज़ तो बनेगी नहीं। एक अच्छे नौकर के नाप की कमीज़ बनवा ली गई है। इसमें दूसरों को फ़िट होना होगा।”


“मैं अपनी कमीज़ नौकर को कभी देना नहीं चाहूँगा। जो मैं पहनता हूँ उसे नौकर पहने, यह मुझे पसन्द नहीं है। मैं घर का बचा-खुचा खाना भी नौकरों को देने का हिमायती नहीं हूँ। जो स्वाद हमें मालूम है, उनको कभी नहीं मालूम होना चाहिए। अगर यह हुआ तो उनमें असन्तोष फैलेगा। बाद में हम लोगों की तकलीफ़ें बढ़ जाएँगी। खाना उनको वैसा ही दो, जैसा वे खाते हैं। जैसा हम खाते हैं, वैसा बचा हुआ भी मत दो। ये पेट भरते हैं, चाहे आधा या चौथाई। स्वाद से इनको कोई मतलब नहीं। सड़क के किनारे चाट खानेवाले, चाट खाकर जो फेंकते हैं, यह मुझे ग़ुस्सा दिलाता है। इसी के कारण आवारा ग़रीब लड़के पत्ते चाटकर जादुई स्वाद का पता लगा लेते हैं, जिससे चोरी, गुण्डागर्दी और हक़ माँगनेवाली झंझटें बढ़ी हैं। स्वाद हम लोगों को सन्तोष नहीं दे सका तो इनको क्या देगा? अगर ये स्वाद के चक्कर में पड़ गए तो अपनी जान बचानी मुश्किल होगी।”


“अदब और क़ायदे आदमी को बहुत जल्दी कायर बना देते हैं। ऐसा आदमी झगड़ा नहीं करता।”


“घर एक ऐसी जगह थी जहाँ आदमी के विचार एक दूसरी सतह से उठते थे। आदमी से अलग होकर, घर के कोने से विचार उठते थे।”


“ख़तरे के दूर होते ही ख़तरे का सामना करने की हिम्मत बढ़ जाती है।”


“छुट्टी से मुझे घबराहट होती है। छुट्टी मुझे एक ऐसी फ़ुर्सत लगती है जिसमें एक आदमी अपना ही तमाशा देखता है।”


“तुम्हारी नौकरी लग गई है, शादी करना अब ज़रूरी हो गया है। शादी-शुदा आदमी नौकरी के प्रति ईमानदार होता है। बच्चे हो जाने के बाद वह और भी ईमानदार हो जाता है।”


“काम को कर्तव्य से जोड़ने के लिए कहते हैं, पर काम को आप आदमी से नहीं जोड़ते। यदि मैं रोज़ सुबह-शाम साहब के बँगले की घास उखाड़ता रहूँ तब भी बहुत ख़ुश होकर आप मुझे वेतन देंगे। काम का कोई दबाव नहीं है, साहब का दबाव है, पर वह भी काम के लिए नहीं है। मालूम नहीं किसके लिए है? साहब की ख़ुशी की फ़िक्र आप लोग करते हैं, काम की फ़िक्र किसको है? नौकरी का अनुभव, यानी, काम को कैसे अटकाना। यदि मैं अच्छी तरह काम करता हूँ तो नया मुल्ला कहलाता हूँ। मुझे लोग पीर के कमरे में बैठने के लिए कहते हैं। कभी सीधे मज़ार पर जाकर बैठने के लिए कहते हैं। मैं खुर्राट पुराना नौकर होने के पहले रेडियो मिस्त्री बनना चाहता हूँ। बिगड़ा हुआ रेडियो सुधार दूँ और उससे गाने आने लगें, ख़बरें आने लगें तो मुझे लगेगा मैंने कुछ किया है। यहाँ आदमी को बचाने के लिए अनगिनत फ़ाइलें खोलकर नहीं बैठे हैं, साहब को बचाने के लिए फ़ाइलें हैं। काग़ज़ में हमारे दस्तख़त को देखकर साहब दस्तख़त करते हैं, पर वे हमें कहीं भी दस्तख़त करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। अभी तक जितनी भी झंझटें हुई हैं, साहब उसमें कभी नहीं फँसे। हम लोग फँसते हैं। काग़ज़ पर लिखने से मुझे डर लगता है कि ग़लती तो नहीं हो रही है। साले या बड़े भाई किसी को चिट्ठी लिखता हूँ तो लाल डब्बे में डालने के पहले दस बार पढ़ता हूँ कि मैं जो कहना चाहता हूँ, वही लिखा है या नहीं। यह तभी तक है जब तक मुझमें थोड़ी बहुत ईमानदारी बाक़ी है। जब ईमानदारी ख़त्म हो जाएगी तब मुझे फ़ाइलों से डर लगना बन्द हो जाएगा। पहले मुझमें उत्साह था। इसके पहले कि मैं सबकी तरह बेईमान हो जाऊँ, मैं इस संस्था से दूर होना चाहूँगा। इस संस्था को अकेला मैं नहीं बचा सकता। कम-से-कम अपनी ईमानदारी तो बचा सकता हूँ। आप मेरे बड़े भाई को जानते ही हैं। वे नौकरी के नाम से इस हद तक कमा चुके हैं कि उनका उठना-बैठना साहब के लिए होता है। उन्होंने चचेरे बड़े भाई से इसलिए घरेलू सम्बन्ध भी तोड़ लिए कि चचेरे बड़े भाई से साहब नाराज़ हैं। दोनों एक ही दफ़्तर में काम करते हैं। मैं अपने घर की हालत जानता हूँ, परन्तु कुछ भी नहीं जानता, जैसे, अपने घर में अपनी बराबरी से बैठाकर मँहगू को खाना खिलाने की इच्छा होती है, लेकिन मैं अभी तक यह कर नहीं पाया। शुरुआत मेरी ग़लत हुई, मैं उस दिन का इन्तज़ार करने लगा हूँ कि बाई साहब मेरे घर के पाटे पर बैठकर खाना खाएँ। उस वक़्त ज़ोर का पानी गिरता रहे तो मज़ा आएगा। जबकि शुरुआत मँहगू से करनी चाहिए और छप्पर को सुधरवाकर करनी चाहिए ताकि मँहगू को खाना खाते समय तकलीफ़ न हो। मुझे अम्मा की सख़्त ज़रूरत है।”


“जवान औरतों को जान जाने से ज़्यादा बलात्कार का डर रहता था। परन्तु पत्नी को जान जाने का ज़्यादा डर था। मैं सोचता था कि उसे बलात्कार का डर ज़्यादा होना चाहिए। अगर उसकी जान चली जाए तो मुझे बहुत दुःख होगा, इतना दुःख कि उसे भोगने के लिए मुझे पूरी ज़िन्दगी जीना होगा। आत्महत्या को मैं बेवक़ूफ़ी समझता था। तब पत्नी की जान जाने से मैं दुःखी होता, पर अपमानित नहीं होता। बलात्कार होने से लोगों की सहानुभूति मेरे साथ नहीं होती! लोगों के सन्दर्भ से सोचने में धोखा होता था। बलात्कार से ज़्यादा बड़ी दुर्घटना जान जाना है। पर चलन ऐसा नहीं था। दूसरों की सहानुभूति, हमारा स्वाभिमान तैयार करती थी।”


“तीन दिन के भूखे आदमी को यदि समझदारी से गुदगुदाया जाए तो उसे भी हँसी आ जाएगी, इस समझदारी के शिकार करोड़ों आदमी थे।”


“क़दमों से दूरी नापना ग़लत काम है। पहले ज़िन्दगी के प्रति मेरे मन में उत्साह था इसलिए लम्बे क़दम रखता था। अब उत्साह कम हो जाने के कारण छोटे-छोटे क़दम रखना पड़ता है। पहले मोटरस्टैण्ड से रेलवे स्टेशन कम दूर था। अब ज़्यादा दूर हो गया है। मेरे घर से तुम्हारा घर भी दूर हो गया। पड़ोसी, मित्र, अस्पताल, स्कूल ग्राउण्ड पहले से दूर हो गए हैं। अपन दोनों कितने दिनों बाद मिले हैं। शराब भट्टी, माता देवालय जैसी जगहों में न पहले जाता था, न अब, इसलिए ये उतनी ही दूर हैं।”


“सुनो, एक आदमी हमेशा लड़ता रहा और हमेशा हारता रहा। आख़िरी बार हारकर जब वह मरने लगा तो लोगों ने उससे पूछा—अब तो तुम मर रहे हो, कम-से-कम एक बार तो जीत जाते। हम लोगों को दुःख है कि अब तुमसे लड़ाई नहीं होगी। तुम्हें कितनी बार हारना है, इसकी गिनती आज पूरी हो चुकी है। उस भीड़ में हमारी-तुम्हारी उम्र के लड़के भी थे। मरनेवाले आदमी ने जवाब में मुस्कराते हुए कहा, ‘उधर देखो, मैं कितनी तैयारी के साथ चला आ रहा हूँ।’

लोग उधर देखने लगे, जिधर उसने इशारा किया था। वहाँ कुछ पेड़ों के सिवाय कुछ भी नहीं था। उन सब लोगों को बुद्धू बन जाते देख मरनेवाले का लड़का, जो उदास खड़ा था, खिलखिलाकर हँस पड़ा। अपने लड़के को हँसता देखकर आदमी मुस्कराकर मर गया। तब उसके लड़के ने सोचा कि उसे जल्दी तैयार होकर पेड़ों की तरफ़ से आना होगा।”


“हर चमक के साथ आवाज़ होती तो अच्छा लगता। जैसे पटाखे फूटते ही चमक होती है। पटाखे की लड़ यानी एक के बाद एक की चमक और एक के बाद एक की आवाज़।”


“दिन या रात को देखने के लिए किसी एक तरफ़ नहीं देखना पड़ता। इसे दिखाने के लिए उँगली से इशारा नहीं करना पड़ता, कि वो देखो दिन खड़ा है। आँख खुलते ही दिन दिखता था, किसी को भी देखने से।”


“उधार लेने का मतलब भविष्य तक भुक्कड़ हो गए।”


“यह वहम बढ़ता जा रहा था कि मेरा दुरुपयोग हो रहा है। हर वह आदमी जो अच्छा व्यवहार करता है, तब सोचता हूँ कि इसका कोई बड़ा स्वार्थ है, बेवक़ूफ़ बना रहा है। अच्छा व्यवहार और सहायता के लिए तत्पर होना, यानी, आदमी को उस रेंज पर लाना है जहाँ से उस पर अचूक निशाना लगाया जा सके।”

'दीवार में एक खिड़की रहती थी' से उद्धरण

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विनोद कुमार शुक्ल
विनोद कुमार शुक्ल हिंदी के प्रसिद्ध कवि और उपन्यासकार हैं! 1 जनवरी 1937 को भारत के एक राज्य छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव में जन्मे शुक्ल ने प्राध्यापन को रोज़गार के रूप में चुनकर पूरा ध्यान साहित्य सृजन में लगाया! वे कवि होने के साथ-साथ शीर्षस्थ कथाकार भी हैं। उनके उपन्यासों ने हिंदी में पहली बार एक मौलिक भारतीय उपन्यास की संभावना को राह दी है। उन्होंने एक साथ लोकआख्यान और आधुनिक मनुष्य की अस्तित्वमूलक जटिल आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति को समाविष्ट कर एक नये कथा-ढांचे का आविष्कार किया है।