अरुंधति रॉय के हिन्दी उद्धरण | Quotes in Hindi by Arundhati Roy

किताब: ‘मामूली चीज़ों का देवता’ [The God of Small Things]
लेखिका: अरुंधति रॉय
अनुवाद: नीलाभ
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

चयन: पुनीत कुसुम

 

“उसके पास कुछ और स्मृतियाँ भी हैं, जिन्हें सँजोए रखने का उसे कोई अधिकार नहीं है।”

 

“वह अपने साथ गुज़रती हुई रेलगाड़ियों की आवाज़ें लायी थी और वह रोशनी और छाया जो तुम पर पड़ती है अगर तुम्हारे पास खिड़की वाली सीट हो।”

 

“यह दिलचस्प है कि कैसे मृत्यु की स्मृति कभी-कभी उस जीवन की स्मृति की तुलना में कहीं देर तक ज़िन्दा रहती है, जिसे उसने हस्तगत कर लिया होता है।”

 

“उन्होंने तय किया कि चूँकि उसे पति नहीं उपलब्ध हो सकता था, इसलिए शिक्षा उपलब्ध करने में उसका कोई नुक़सान नहीं था।”

 

“उनका कहना था कि एक औरत के लिए अपने पति के नाम और अपने पिता के नाम के बीच चुनाव करना कोई ख़ास मानी नहीं रखता था।”

 

“सारी हिन्दुस्तानी माएँ अपने बेटों से अभिभूत रहती हैं और इसीलिए वे उनकी योग्यताओं के सिलसिले में सही न्याय नहीं कर पातीं।”

 

“गन्ध, संगीत की तरह, स्मृतियों को सम्भाले रखती है।”

 

“जब तुम लोगों को चोट पहुँचाते हो तो वे तुम्हें पहले से थोड़ा कम प्यार करने लगते हैं। लापरवाही से बोले गए शब्द ऐसा ही करते हैं। वे लोगों को तुम्हें पहले से थोड़ा कम प्यार करने के लिए मजबूर कर देते हैं।”

 

“दूसरों की ग़रीबी की तरह, दुर्गन्ध भी आदी होने का ही मामला है। अनुशासन का मामला है। कठोरता और एयर-कण्डीशनिंग का मामला है। बस, और कुछ नहीं।”

 

“कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो भुलायी जा सकती हैं। और कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो भुलायी नहीं जा सकतीं―जो गर्द से अटे ख़ानों में द्वेष-भरी आँखों से अगल-बग़ल घूरने वाले भुस-भरे पक्षियों की तरह बैठी रहती हैं।”

 

“आख़िरकार, कितना आसान होता है एक कहानी को चूर-चूर कर देना। ख़यालों के एक सिलसिले को तोड़ देना। एक सपने के टुकड़े को नष्ट कर देना, जिसे चीनी मिट्टी के किसी पात्र की तरह सावधानी से सँजोकर यहाँ-वहाँ ले जाया जा रहा हो। उसे जीवित रहने देना, उसका साथ देना, कहीं अधिक कठिन काम है।”

 

“एक मछुआरे के लिए यह मान लेना कितना ग़लत है कि वह अपनी नदी को अच्छी तरह जानता है।”

 

“उन्होंने आसानी से माफ़ कर दिए जाने की माँग नहीं की थी। वे सिर्फ़ ऐसी सज़ाएँ चाहते थे, जो उनके अपराधों से मेल खाएँ।”

 

“इतिहास रात में एक पुराने मकान सरीखा है, जिसकी सारी बत्तियाँ रोशन हों और अन्दर पुरखे फुसफुसा रहे हों। इतिहास को समझने के लिए हमें अन्दर जाकर यह सुनना होगा कि वे क्या कह रहे हैं। और किताबों और दीवार पर टँगी तस्वीरों को देखना होगा। और गन्ध सूँघनी होगी। मगर हम भीतर नहीं जा सकते क्योंकि दरवाज़े हमारे लिए बन्द हैं। और जब हम खिड़कियों से भीतर झाँकते हैं, हमें सिर्फ़ परछाइयाँ दिखायी देती हैं। और जब हम सुनने की कोशिश करते हैं, हमें सिर्फ़ फुसफुसाहटें सुनायी देती हैं। और हम फुसफुसाहटों को समझ नहीं पाते क्योंकि हमारे दिमाग़ों में एक युद्ध छिड़ा हुआ है। एक युद्ध जिसे हमने जीता भी है और हारा भी है। सबसे ख़राब क़िस्म का युद्ध। ऐसा युद्ध जो सपनों को बन्दी बनाता है और उन्हें फिर से सपनाता है। ऐसा युद्ध जिसने हमें अपने विजेताओं की पूजा करने और अपना तिरस्कार करने पर मजबूर किया है।”

 

“हम युद्ध-बन्दी हैं। हमारे सपनों में मिलावट कर दी गयी है। हम कहीं के नहीं रहे हैं। हम अशान्त समुद्रों पर लंगरविहीन जहाज़ की तरह यात्रा कर रहे हैं। हो सकता है, हमें कभी किनारा न मिले। हमारे दुःख कभी उतने दुःखद नहीं होंगे। न हमारे सुख कभी उतने सुखद। हमारे सपने कभी उतने विशाल न होंगे। न हमारी ज़िन्दगियाँ उतनी महत्त्वपूर्ण कि उनकी कोई अहमियत हो।”

 

“इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि कहानी शुरू हो चुकी थी, क्योंकि कथकली ने बहुत पहले यह खोज कर ली थी कि महान गाथाओं का रहस्य यह होता है कि उनमें कोई रहस्य नहीं होता। महान गाथाएँ वे होती हैं जिन्हें तुमने सुन रखा होता है और जिन्हें तुम फिर से सुनना चाहते हो। जिनमें तुम कहीं से भी प्रवेश कर सकते हो और आराम से रह सकते हो। वे तुम्हें सनसनी और रोमांच और चतुराई-भरे अन्त से धोखा नहीं देतीं। वे तुम्हें अप्रत्याशित चीज़ों से चकित नहीं करतीं। वे उतनी ही चिर-परिचित होती हैं जितना वह घर जिसमें तुम रहते हो। या जितनी तुम्हारे प्रेमी की त्वचा। तुम जानते हो उनका अन्त क्या है, फिर भी तुम यों सुनते हो जैसे तुम्हें पता न हो। उसी तरह जैसे हालाँकि तुम जानते हो कि एक दिन तुम मर जाओगे, तुम यों जीत हो जैसे तुम कभी मरोगे नहीं। महान गाथाओं में तुम जानते हो कि कौन जीवित रहता है, कौन मरता है, किसे प्रेम मिलता है, किसे नहीं। और इसके बावजूद तुम फिर से जानना चाहते हो।”

 

“यह आदमी आज की रात ख़तरनाक है। पूरी तरह हताश। यह कथा वह सुरक्षा जाल है जिसके ऊपर यह एक दीवालिया सर्कस के बेमिसाल जोकर की तरह कलाबाज़ी के करतब दिखाता है, हवा में झपट्टे मारता है, गोते लगाता है। उसके पास बस यही है जो उसे दुनिया के बीच से किसी गिरते पत्थर की तरह धमाके से गिर पड़ने से बचाता है। यही उसका रंग है और उसकी रोशनी। यह कथा ही वह पात्र है जिसमें वह ख़ुद को उँडेलता है। वह उसे आकार देती है। रूप देती है। उसे बाँधती है। उसे समोये रखती है। उसे। उसके प्रेम को। उसके उन्माद को। उसकी आशा को। उसके असीमानन्द को। विडम्बना यही है कि उसका संघर्ष एक अभिनेता के संघर्ष का उलट है—वह एक भूमिका में प्रवेश करने का नहीं, बल्कि उससे भाग निकलने का प्रयास करता है। लेकिन यही वह कर नहीं सकता। उसकी इस दयनीय पराजय में ही उसकी सबसे बड़ी जीत है। वह कर्ण है जिसे दुनिया ने त्याग दिया है। एकाकी कर्ण। कण्डम माल। दरिद्रता में पला एक राजकुमार। जिसका जन्म अपने भाई के हाथों अन्यायपूर्ण ढंग से, निहत्थे और अकेले मारे जाने के लिए हुआ है। अपनी सम्पूर्ण हताशा में महिमा से मण्डित। गंगा के तट पर प्रार्थना करता हुआ। नशे में बेतरह धुत्त।”

 

“दोनों भाई-बहन यह जानने के लिए अभी बहुत छोटे थे कि ये लोग महज़ इतिहास के गुमाश्ते थे। उन लोगों से हिसाब-किताब करने और बक़ाया वसूलने के लिए भेजे गए, जो इतिहास के नियमों का उल्लंघन करते हैं। ऐसी भावनाओं से प्रेरित जो पुरातन थीं, मगर विरोधाभास यह कि पूरी तरह निर्वैयक्तिक थीं। उस तिरस्कार की भावनाएँ, जो आदिम, अस्वीकृत भय से जन्मी थीं—सभ्यता के भीतर प्रकृति का भय, मर्दो के अन्दर औरतों का भय, शक्ति के भीतर शक्तिहीनता का भय। मनुष्य की उस सब को नष्ट करने की अचेतन लालसा जिसे वह न तो अपने अधीन कर सकता है और न देवत्व के पद पर आसीन कर सकता है।”

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