कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘ज़िन्दगीनामा’ से उद्धरण | Quotes from ‘Zindaginama’ by Krishna Sobti

 

“बच्चों, जुग चार होते हैं:
सोता हुआ कलजुग
छोड़ता हुआ द्वापर
खड़ा हुआ त्रेता और
चलता हुआ सतजुग।”

 

“मनुक्ख के मन को किसने बाँधा है! जिधर बह गया, बहने लगा।”

 

“चन्न वह जो चान्नना करे।”

 

“रूख वही रहता है, उसके रखवाले बदलते रहते हैं।”

 

“फ़ौजी बन्दे दुनिया-जहान घूमने निकल जाएँ पर दिल अपना पोटली में बाँधकर अपने पिंड के पुराने रूख पर लटका जाते हैं।”

 

“असली मुर्ग़ और असली मुग़ल दूर से पहचाने जाते हैं।”

 

“मुक़द्दमे का मुँह-माथा पीछे, उसकी पीठ की छानबीन पहले।”

 

“आल माल
पहला थाल
माँ मेरी के
लम्बे बाल
कूएँ हेठ पानी
माँ मेरी रानी
काढ़ेगी कसीदड़ा
दूध पाए मथानी।”

 

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कृष्णा सोबती
कृष्णा सोबती (जन्म-१८ फ़रवरी १९२५, गुजरात में) (सम्बद्ध भाग अब पाकिस्तान में) मुख्यतः हिन्दी की आख्यायिका (फिक्शन) लेखिका हैं। उन्हें १९८० में साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा १९९६ में साहित्य अकादमी अध्येतावृत्ति से सम्मानित किया गया था। अपनी बेलाग कथात्मक अभिव्यक्ति और सौष्ठवपूर्ण रचनात्मकता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने हिंदी की कथा भाषा को विलक्षण ताज़गी़ दी है। उनके भाषा संस्कार के घनत्व, जीवन्त प्रांजलता और संप्रेषण ने हमारे समय के कई पेचीदा सत्य उजागर किये हैं।