रात चाँद की घरवाली
चाँद पियक्कड़
घरवाला

डगमगा रहे कदम
साले के
इतनी पी ली है हाला

कभी श्वेत,
कभी काला,
श्याम-सलोना गोपाला

घूम-घाम के, पी-पा के
रात गए, जब घर आता
रात चखाती निवाला

रात की सउरी
पहलू में बैठी
अम्मी, फूफी, ख़ाला

मूड रहा ग़र चाँद का
रात को बिठा स्कूटर पर
घुमाता बड़का ताला

रात रखती तीज, करवा
रचाती महँदी, महावर
सुहाती जैसे मधुबाला

रात बहुरिया
दिवाली ख़ातिर
मारती मकड़ जाला

चाँद कमीना,
चाँद चटोरा, चाँद निगोरा
टकराता रहता प्याला

रात चाँद की घरवाली
चाँद पियक्कड़
घरवाला

(2018)

 

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कुशाग्र अद्वैत
कुशाग्र अद्वैत बनारस में रहते हैं, इक्कीस बरस के हैं, कविताएँ लिखते हैं। इतिहास, मिथक और सिनेेमा में विशेष रुचि रखते हैं।अभी बनारस हिन्दू विश्विद्यालय से राजनीति विज्ञान में ऑनर्स कर रहे हैं।

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