जब सब कुछ चुप हो, निःशब्द
तब का शोर सबसे तीव्र होता है।
बारिश की आखिरी बूँद का धीरे से भी
ज़मीन पर पैर रखना सुनाई दे जाता है।
हवा से हिलती पत्तियों की एक-एक साँस से भी
मेरी नींद टूटती है तब।
पंखे का बेसुध छत को पकड़ कर घूमना,
फ्रीज की खुद के तापमान को बनाए रखने की जद्दोजहद
रात के अपनेपन में हर चीज अस्तित्व में आ जाती है।
ऊपर से घड़ी की ये टिक-टिक की आवाज़… उफ्फ!
मैं अक्सर खुद को घड़ी की सुइयों के बीच फँसा हुआ पाती हूँ
जहाँ से वक्त ना आगे बढ़ता दिखता है, ना पीछे छूटता
बस मेरे चारों ओर गोल-गोल घूमता नजर आता है…

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1 COMMENT

  1. में जिस जगह सोता था, मोर व हां रात को ही बोलता।
    ओर कोयल उसी से सुर मिलाने लगती।
    विश्वविद्यालय का वो कमरा , नीम के पेड़ के बगल में
    अब मानो रात के पुकारता है।

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