रात कितनी ही फ़िक्रें सर पर थीं

‘Raat Kitni Hi Fikrein Sar Par Thin’, a nazm by Tasneef Haidar

रात कितनी ही फ़िक्रें सर पर थीं

जिस मकां में मेरी रिहाइश है
उसे दो माह में बदलना है
चार छह सात काम करने हैं
एक नॉवेल अभी अधूरा है

ख़र्च ज़्यादा है और साँसें कम
ज़िन्दगी की गरानियाँ तोबा
इज़्ज़तों का ख़याल, घर की फ़िक्र
मौत सी जिंदगानियाँ तोबा

इन किताबों का फ़ायदा क्या है
क्या इन्हें भी किसी को दे दूँ मैं
क़र्ज़ कुछ दोस्तों का बाक़ी है
क्या उन्हें कुछ दिनों का कह दूँ मैं

दोस्त कोई न राज़दार कोई
बस मेरा अन्दरून जानता है
ख़्वाब का क़त्ल किस ख़ुदा ने किया
आस्तीनों का ख़ून जानता है

क्या इन्हीं बे-ज़मीर लोगों में
ज़िन्दगी काटनी पड़ेगी मुझे
इन्हीं ज़ुल्मत मिसाल गलियों से
रौशनी छाटनी पड़ेगी मुझे

भेड़ियों से ज़ियादा मौक़ा परस्त
ये सियासत ज़दा सफ़ेद हिरन
चापलूसी पसंद तलवों पर
डाल कर बैठते हैं जो रोग़न

शायरी शोहरतों से सीटियों तक
इल्म से बे ख़बर, ख़ला में ख़ुश
एक दो तीन लाख फ़ॉलोअर्ज़
हर कोई है इसी हवा में ख़ुश

इश्क़ जिससे करो वही कम्बख़्त
किसी इक दूसरे का आशिक़ है
या तो मैं ही बहुत कमीना हूँ
या तो वो ही बहुत मुनाफ़िक़ है

आने वाले दिनों के अन्देशे
और बीते दिनों की रुसवाई
दूसरी सम्त मुझको डसती थी
अपने बिस्तर की नीम तन्हाई

अलग़रज़ इतने सारे झगड़ों को
कैसे इक शब में झेलता मैं भी
माँ की गाली दी इक ज़माने को
और चुप चाप सो गया मैं भी!

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