बरसों से स्तम्भ
किरणें पी-पीकर
भर जातें होंगे इनमे सब रंग;

अकेले सह कर
दूर रह-रहकर
अपनी ही सीमाओं में घिरकर
भीतर ही गहराईयों में
बना लेते होंगे ये सुरंग;

आँगन में अपने ही
सिसक-सिसक कर
बारिशों से लड़ कर
बुन लेते होंगे ये बग़ीचे;

पर फिर भी,
सोचो ज़रा
अजीब सी बात है,
ये सब धरोहर स्थल
प्राचीन मंदिर
रात में इतने खूबसूरत क्यों लगते हैं?

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