किताब: ‘अवर मून हैज़ ब्लड क्लॉट्स’ – राहुल पंडिता 
रिव्यू: तसनीफ़ हैदर

कश्मीरी पंडितों के बारे में लिखी गयी किताबों में ये एक अहम किताब है। आप सभी को पढ़नी चाहिए। राहुल पंडिता ख़ुद कश्मीरी पंडित हैं और ये उनकी कश्मीर से जुड़ी यादों पर मुश्तमिल किताब है। मज़हबी नफ़रत और ज़ुल्म को झेलने की इस दास्तान में ही इंसानियत के बहुत से रौशन पहलू भी हैं। राहुल पंडिता ने किताब में एक बच्चे के ज़हन पर अपनी मज़हबी शनाख़्त की वजह से होने वाले हमले और ख़ौफ़ को बहुत सलीक़े से लिखा है। कश्मीर के इतिहास पर उन्होंने पहले जो बातें लिखी हैं वो दिलचस्प हैं, मगर इस पर ज़्यादा तफ़सील से पढ़ने के लिए आपको इक़बाल चंद मल्होत्रा और मारूफ़ रज़ा की ‘अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ कश्मीर’ और अशोक कुमार पांडेय की ‘कश्मीरनामा’ पढ़नी चाहिए। हम अभी इस तफ़सील में नहीं जाएँगे, मगर इतना बताना काफ़ी होगा कि शुरुआत में वादी एक झील की सूरत में थी, जिसके बसने की कहानी की कुछ झलकियाँ हिन्दू माइथोलॉजिकल रिवायतों में मिलती हैं। मगर कश्मीर में शाह-मीरी हुकूमत के क़ायम होने के बाद पहले सिकंदर बुत-शिकन और फिर अफ़ग़ान हुकूमत के दौर में पंडितों पर जो ज़ुल्म हुए हैं, उनको पढ़कर जी हौलने लगता है। ऐसा नहीं है कि इस्लामी हुकूमत से पहले कश्मीर में पंडितों की आबादी हमेशा सुकून से रही है और मंदिरों पर कोई हमले नहीं हुए हैं। अशोक कुमार पांडेय ने अपनी किताब कश्मीरनामा में इस पर तफ़सील से लिखा है और बताया है कि मंदिरों को तोड़ने की वजह मज़हबी से ज़ियादा सियासी और मआशी (आर्थिक) थी। इस सिलसिले में उन्होंने कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ के हवाले से जो बातें लिखी हैं वो पढ़नी चाहिए। हाँ, मगर पंडितों के क़त्ल और उनपर होने वाले ज़ुल्म ने मज़हबी बुनियाद पर ज़्यादा गहरा असर दिखाया और बक़ौल राहुल पंडिता एक समय ऐसा आया जब ‘सिकंदर बुत शिकन‘ ने इतने पंडितों को क़त्ल करवाया कि इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि क़त्ल होने वाले पंडितों के जनेऊ ‘सात टोकरों’ तक भरे हुए थे। तारीख़ बताती है कि ज़ैनुल आबिदीन बादशाह के दौर तक कश्मीरी पंडितों के सिर्फ़ ग्यारह ख़ानदान कश्मीर में बाक़ी बचे थे।

इसी तरह अफ़ग़ान दौर में होने वाले ज़ुल्म को राहुल पंडिता ने एक ग़ैर-मुल्की राइटर के हवाले से बयान किया है और बताया है कि किस तरह कश्मीर में पंडितों के सर पर कीचड़ से भरे घड़ों को रख कर उनको अफ़ग़ान सिपाही अपने मज़े के लिए पत्थर से फोड़ा करते थे। और जहाँ कोई कश्मीरी पंडित रास्ते में नज़र आता उस पर कोई भी मुसलमान सवार होकर उसे दौड़ाने लगता।

राहुल पंडिता की ये किताब बारीकी से पढ़ने की ज़रूरत है। एक कश्मीरी पंडित लड़के का सिर्फ़ इसलिए जनेऊ पहनने से इंकार करना क्यूंकि कश्मीर में ये बात मशहूर थी कि कश्मीरी पंडितों को पीटना या मारना बहुत आसान है उसकी मनोवैज्ञानिक स्तिथि को दर्शाता है। उसका घर छीन लिया जाना। उसके दोस्तों का अजनबी और दुश्मन बन जाना। जानने और पहचानने वालों का अचानक सख़्त मज़हबी हो जाना और सियासी रहनुमाओं के अजीब ओ ग़रीब बयान का ज़िक्र उसके सामने होना, उसके दिल ओ दिमाग़ पर गहरा असर न डाले, ये मुमकिन ही नहीं। राहुल पंडिता ने अपनी आँखों से अपने घर के बाहर एक भीड़ द्वारा मंदिर को तहस नहस होते देखा है, इसलिए वो जानते हैं कि भीड़ जब अचानक मज़हबी बन जाए और बहुसंख्यक अचानक उग्र और जुनूनी हो जाएँ तो मायूसी किस हद तक अपने नरग़े में ले लेती है। उनके बारे में कहा गया कि वो यूँ तो बहुत सेक्युलर हैं मगर कश्मीर के मुआमले में अपने पूर्वाग्रहों से बच नहीं पाते हैं, मगर किताब पढ़ने पर मालूम होता है कि उन्होंने जो कुछ झेला है उसके बाद ‘सेक्युलर’ नाम के शब्द से चिढ़ न होना और इंसानियत पर भरोसा क़ायम रहना बहुत बड़ी बात है।

किताब में दो एक क़िस्से ऐसे हैं जो पढ़ने वाले को ख़ुद ऐसे मुआमलों से डील करना सिखाते हैं। यानी जो कुछ आज कल हम पूरे मुल्क में देख रहे हैं, उसमें ख़ुद कैसे मज़हबी नफ़रत से दूर रहा और बचा जा सकता है वो दो क़िस्सों को पढ़ कर साफ़ पता चलता है।

पहला क़िस्सा ये है कि जब भीड़ ने उनके घर के पास बने मंदिर को तोड़ दिया और वो मायूस होकर अपने घर के बग़ीचे में बहुत देर तक गुम-सुम लेटे रहे तो उनके दादा के छोटे भाई (जिनसे राहुल को बेहद मोहब्बत थी) कैसे उन्हें आकर स्वामी विवेकानंद का एक क़िस्सा सुनाते हैं और समझाते हैं कि ‘भगवान हमारी हिफ़ाज़त करता है, हम उसकी हिफ़ाज़त नहीं करते और न कर सकते हैं।’

किताब का वो हिस्सा भी ग़ौर से पढ़ा जाना चाहिए जिसमें राहुल पंडिता ने कश्मीर से आने के बाद जम्मू में अपने पिता की परेशानियों और वहाँ के हिन्दुओं के सुलूक के बारे में तफ़सील से लिखा है। ऐसे में हम देखते हैं कि एक तरफ़ छोटे से लड़के को मज़हबी नफ़रत का शिकार बना कर ‘आर एस एस’ का एक नेता कैसे उन्हें एक कट्टर हिन्दू बनाने और हिन्दुओं के हक़ के लिए लड़ने की तरफ़ धकेल देना चाहता है तो वहीं मजबूर और बेबस राहुल के परिवार को किस तरह उनका मकान मालिक और मालकिन सताकर और परेशान करके मज़े लेते हैं। उनके दुःख और दर्द जानने के बावजूद उन्हें ताने देते हैं और उनके साथ बद-सुलूकी में कोई कसर नहीं उठा रखते हैं।

ये कहानी सिर्फ़ राहुल के परिवार की नहीं बल्कि उन लाखों कश्मीरी पंडितों की थी, जो एक तरफ़ कश्मीर में मज़हबी नफ़रत की वजह से अपना घर बार गँवा कर आये थे तो दूसरी तरफ़ उन्हें उनके ही हम-मज़हबों के हाथों उत्पीड़न और नफ़रत का शिकार होना पड़ा था।

मज़हब नफ़रत के मुआमले में सिर्फ़ एक सियासी हरबा बन के रह जाता है। रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गाँधी’ में लिखा है कि पाकिस्तान के जो क़बाइली जिहाद के नाम पर पुँछ ज़िले तक हिन्दू लोगों को जान से मारते और उनकी बेटियों का रेप करते हुए आए, वो बारामूला तक आते-आते मुसलमान लोगों को लूटते, क़त्ल करते और उनकी बच्चियों और औरतों का रेप करते नज़र आने लगे। इसकी एक झलक ‘अवर मून हैज़ ब्लड क्लॉट्स’ में भी मिलती है जहाँ राहुल के मामू का सुनाया हुआ क़िस्सा है, जब उनके वालिद की जेब से वो चंद पैसे भी हथियार बंद क़बाइली पठानों ने लूट लिए, जिनके सामने उन्होंने अल्लाह ओ अकबर के नारे भी लगाए थे और ख़ुद को मुसलमान बना कर पेश किया था।

अल-ग़रज़ किताब में बहुत से क़िस्से दर्द और तकलीफ़ से भरे हुए हैं। मगर सबसे ख़तरनाक है आम लोगों का अपनी मज़हबी पहचान से जुड़कर अपने ही पड़ोसियों और दोस्तों से नफ़रत करने लगना। इस सिलसिले में आप जब भी ये किताब पढ़ें, ‘बी-के गंजू’ का क़िस्सा पढ़ कर यक़ीनन आप की आँखें आँसुओं से भीग जाएँगी। जिसमें एक बीवी के सामने उसके शौहर को चावलों के ड्रम से निकाल के मार दिया जाता है, और वो भी किसकी निशानदेही पर? उस पड़ोसी औरत की, जो उनके बग़ल में न जाने कितने बरसों से आबाद थी।

लेकिन इंसानियत को बचाकर रखने की राहुल पंडिता की इस कोशिश ने ही, एक टीवी डिबेट में सुर्ख़ आँखों वाले एक आर्मी जनरल के सामने ‘कश्मीर में आम लोगों पर होने वाले ज़ुल्म’ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने पर ये जताए जाने पर कि इन्ही कश्मीरी लोगों की वजह से उनका घर छूटा है और वो अपने मुल्क में रिफ्यूजी बना दिए गए हैं, उन में ये जवाब देने की सलाहियत पैदा की कि ‘जनरल! आई हैव लॉस्ट माय होम, नॉट ह्यूमैनिटी।’ यानी मैंने अपना घर खोया है, अपनी इंसानियत नहीं।

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