Editors' Picks

पास रहो

तुम मेरे पास रहो मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो जिस घड़ी रात चले, आसमानों का लहू पी के सियह रात चले मरहम-ए-मुश्क लिए, नश्तर-ए-अल्मास लिए बैन करती हुई, हँसती...

पिताजी का समय

अपने घर में मैं परम स्वतंत्र था। जैसे चाहे रहता, जो चाहे करता। मर्ज़ी आती जहाँ जूते फेंक देता, मन करता जहाँ कपड़े। जगह-जगह...

तेरे वाला हरा

चकमक, जनवरी 2021 अंक से कविता: सुशील शुक्ल  नीम तेरी डाल अनोखी है लहर-लहर लहराए शोखी है नीम तेरे पत्ते बाँके हैं किसने तराशे किसने टाँके हैं नीम तेरे फूल बहुत झीने भीनी ख़ुशबू शक्ल से पश्मीने नीम...

चोर

मुझे बेशुमार लोगों का क़र्ज़ अदा करना था और ये सब शराबनोशी की बदौलत था। रात को जब मैं सोने के लिए चारपाई पर...

होने की सुगन्ध

यही तो घर नहीं और भी रहता हूँ जहाँ-जहाँ जाता हूँ, रह जाता हूँ जहाँ-जहाँ से आता हूँ, कुछ रहना छोड़ आता हूँ जहाँ सदेह गया नहीं वहाँ...

इश्तहार

इसे पढ़ो इसे पढ़ने में कोई डर या ख़तरा नहीं है यह तो एक सरकारी इश्तहार है और आजकल सरकारी इश्तहार दीवार पर चिपका कोई देवता या अवतार...

इति नहीं होती

धीर धरना राग वन से रूठकर जाना नहीं पाँखी। फिर नए अँखुए उगेंगे इन कबन्धों में, यह धुँआ कल बदल सकता है सुगन्धों में, आस करना कुछ कटे सिर देख घबराना...

एक कम है

अब एक कम है तो एक की आवाज़ कम है एक का अस्तित्व, एक का प्रकाश एक का विरोध एक का उठा हुआ हाथ कम है उसके मौसमों के...

कहो तो

कहो तो 'इन्द्रधनुष' ख़ून-पसीने को बिना पोंछे दायीं ओर भूख से मरते लोगों का मटमैले आसमान-सा विराट चेहरा बायीं ओर लड़ाई की ललछौंही लपेट में दमकते दस-बीस साथी उभरकर आएगा ठीक तभी सन्नाटे...

कृष्णा सोबती – ‘मित्रो मरजानी’

कृष्णा सोबती के उपन्यास 'मित्रो मरजानी' से उद्धरण | Quotes from 'Mitro Marjani', a Hindi novel by Krishna Sobti   "इस देह से जितना जस-रस ले...

STAY CONNECTED

34,951FansLike
14,116FollowersFollow
22,311FollowersFollow
827SubscribersSubscribe

Recent Posts

Faiz Ahmad Faiz

पास रहो

तुम मेरे पास रहो मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो जिस घड़ी रात चले, आसमानों का लहू पी के सियह रात चले मरहम-ए-मुश्क लिए, नश्तर-ए-अल्मास लिए बैन करती हुई, हँसती...
Swayam Prakash

पिताजी का समय

अपने घर में मैं परम स्वतंत्र था। जैसे चाहे रहता, जो चाहे करता। मर्ज़ी आती जहाँ जूते फेंक देता, मन करता जहाँ कपड़े। जगह-जगह...
Neem Tree

तेरे वाला हरा

चकमक, जनवरी 2021 अंक से कविता: सुशील शुक्ल  नीम तेरी डाल अनोखी है लहर-लहर लहराए शोखी है नीम तेरे पत्ते बाँके हैं किसने तराशे किसने टाँके हैं नीम तेरे फूल बहुत झीने भीनी ख़ुशबू शक्ल से पश्मीने नीम...
Saadat Hasan Manto

चोर

मुझे बेशुमार लोगों का क़र्ज़ अदा करना था और ये सब शराबनोशी की बदौलत था। रात को जब मैं सोने के लिए चारपाई पर...
God, Abstract Human

होने की सुगन्ध

यही तो घर नहीं और भी रहता हूँ जहाँ-जहाँ जाता हूँ, रह जाता हूँ जहाँ-जहाँ से आता हूँ, कुछ रहना छोड़ आता हूँ जहाँ सदेह गया नहीं वहाँ...
Kumar Vikal

इश्तहार

इसे पढ़ो इसे पढ़ने में कोई डर या ख़तरा नहीं है यह तो एक सरकारी इश्तहार है और आजकल सरकारी इश्तहार दीवार पर चिपका कोई देवता या अवतार...
Morning, Sky, Birds, Sunrise, Sunset

इति नहीं होती

धीर धरना राग वन से रूठकर जाना नहीं पाँखी। फिर नए अँखुए उगेंगे इन कबन्धों में, यह धुँआ कल बदल सकता है सुगन्धों में, आस करना कुछ कटे सिर देख घबराना...
Kumar Ambuj

एक कम है

अब एक कम है तो एक की आवाज़ कम है एक का अस्तित्व, एक का प्रकाश एक का विरोध एक का उठा हुआ हाथ कम है उसके मौसमों के...
Abstract, Time

कहो तो

कहो तो 'इन्द्रधनुष' ख़ून-पसीने को बिना पोंछे दायीं ओर भूख से मरते लोगों का मटमैले आसमान-सा विराट चेहरा बायीं ओर लड़ाई की ललछौंही लपेट में दमकते दस-बीस साथी उभरकर आएगा ठीक तभी सन्नाटे...
Mitro Marjani - Krishna Sobti

कृष्णा सोबती – ‘मित्रो मरजानी’

कृष्णा सोबती के उपन्यास 'मित्रो मरजानी' से उद्धरण | Quotes from 'Mitro Marjani', a Hindi novel by Krishna Sobti   "इस देह से जितना जस-रस ले...
कॉपी नहीं, शेयर करें! ;-)