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जिस दिन मैंने गाँव को अलविदा कहा

जिस दिन मैंने गाँव को अलविदा कहा उस दिन मेरा बेटा खेल रहा था केदारनाथ सिंह की कविताओं के साथ और कविताएँ गालों पर चिकोटियाँ काटती हुईं तितली की तरह...

प्रभात की कविताएँ

प्रस्तुति: विजय राही तुम तुमने कहना नहीं चाहा लेकिन कहा पेड़ से बाँध दो इसे खाल उधेड़ो इसकी इच्छा पूरी करो बस्ती की। बाक़ी मुझे बेच दो या शादी करो रहूँगी तो इसी की कौन...

औरतें

औरतें उपले हुआ करती हैं जिन्हें पहले से निर्धारित बिटौरों में समेटकर रखा जाता है, ताकि वे ख़ुद साल भर सर्दी बरसात में भी दुनिया की पेट की आग बुझाने के चलते धीमे-धीमे जल सकें अपने ही...

फ़लक तक चल… साथ मेरे

पर्दों के बीच की झिरी से सूरज की किरणें वनिता के चेहरे पर ऐसे पड़ रही थीं जैसे किसी मंच पर प्रमुख किरदार के...

राहुल बोयल की कविताएँ

1 नदियों में लहलहा रहा था पानी और खेतों में फ़सल, देखकर हर ओर हरियाली हरा हो ही रहा था मन कि अचानक फट पड़ता है बेवक़्त काला पड़ा हुआ...

बाढ़ की सम्भावनाएँ सामने हैं

बाढ़ की सम्भावनाएँ सामने हैं, और नदियों के किनारे घर बने हैं। चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर, इन दरख़्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं। इस तरह...

पृथ्वी सोच रही है

ये जो चारों तरफ़ की हवा है भर गई है उन पैरों की धूल से जो इस पृथ्वी पर सबसे अकेले हो गए हैं वे असंख्य लोग हैं जो...

वो जो कोई थी

वो जो कोई थी किसी ज़माने में मेरी उम्र के सफ़ेद और काले पन्नों के बीच किसी सतरंगी चित्र-सी जिसका तय था सम्बन्ध हमारे मिलने के बहुत पहले से ही, बनना था...

ज़िन्दगी

देश की छाती दरकते देखता हूँ! थान खद्दर के लपेटे स्वार्थियों को, पेट-पूजा की कमाई में जुता मैं देखता हूँ! सत्य के जारज सुतों को, लंदनी गौरांग प्रभु...

अमीर ख़ुसरो की पहेलियाँ – 3

हाड़ की देही उज्जल रंग, लिपटा रहे नारी के संग। चोरी की ना ख़ून किया, वा का सिर क्यों काट लिया। - नाख़ून हर सिर पेड़ सुहावन पात, क्यों बस...

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