रिश्तों की रेत

तुमने कब चाहा
रिश्तों की तह तक जाना
देह तक ही सीमित रहा
तुम्हारा मन
देह को नापती तुम्हारी आँखों ने
देखना चाहा ही नहीं
मन के घुमड़ते ज्वार
देह को नदी समझने की भूल
तुम्हारे समय की पहली और आख़िरी
भूल रही होगी शायद
इसे पार करने की सोच जम गयी है
गहरी काई बनकर
नदी की तलहटी पर
और पाँव रखने से अब
घबराने लगे हो तुम भी
फिसलन का एक गहरा डर
घर कर गया है
तुम्हारे मन में भी
लेकिन मैंने डाल दी है
रेत
देह की नदी पर
जिस पर उभरते जायेंगे
निशान तुम्हारे पैरों के
जब-जब पार करना चाहोगे
पाँव धरकर…

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