रोज़ सवेरे ऑफिस जाते वक़्त
ट्रैफिक की लाल बत्ती पर गाड़ी रुकती थी
रोज़ देखती थी मैं
उस भीड़ में ज़िन्दगी से ज़द्दोज़हद करते लोगों को
कहीं ऑटो के लिए भागते आदमी
ठण्ड में बस का इंतज़ार करते लोग
कुछ सिग्नल तोड़ते, बहुत जल्दी में
हर तरफ एक होड़ आगे बढ़ने की..

उस रोज़, फिर गाड़ी रुकी,
ठण्ड से सिकुड़े हाथों को मैंने जेब से निकाला
और खिड़की पर जमी धुंध को हटाया
एक निवाले के लिए जान झोंकते इन लोगों के बीच
फुटपाथ पर एक लड़की रोटी बना रही थी
वहीं उसने बिलकुल गोल माँ जैसी रोटी बेली
गत्ते से एक हाथ से चूल्हे की आग को सुलगाया
दूसरे हाथ से रोटी सेकने डाल दी
बड़े ही शऊर से उसने रोटी सेकी
और पकी हुई रोटी वहीं फुटपाथ पर रख दी
ट्रैफिक सिग्नल की लाइट हरी हो गई
और गाड़ी आगे बढ़ गई..
पर उस रात जब मैंने रोटी सेकी
तो वो रोटी जल गई..

शायद ट्रैफिक की लाल बत्ती पर गाड़ी ना रुकी होती
तो मैं वो जली हुई रोटी ना खाती..

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