यूँ तो रोटी किसी भी रूप में हो
सुन्दर लगती है
उसके पीछे की आग
चूल्हे की गन्ध और
बनाने वाले की छाप दिखायी नहीं देती
लेकिन होती हमेशा रोटी के साथ है

वह थाली में हो
हाथ में हो
मुँह में हो
या किसी बर्तन में हो तो
उसका दिखना उम्मीद की तरह चमक जाता है

लेकिन यह कितना दर्दनाक है कि
रोटी पटरी पर है और
उसे खाने वाले टुकड़ों में बिखर गए हैं
वे वही लोग हैं जो
उसी रोटी के लिए दर-दर की ठोकरें खाते हुए
रोज जीते रहे, मरते रहे
अपने घर से हज़ारों मील दूर
लेकिन कभी पता नहीं चलने दिया
कि इस रोटी तक पहुँचना कितना मुश्किल है

आज जब वे नहीं हैं तब उनकी यातना सामने आयी है
ये महज़ रोटी नहीं जिसकी तारीफ़ में कसीदे गढ़े जाएँ
ये इस बर्बर समय की ज़िन्दा गवाही है
जो बता रही है कि
वे कौन लोग थे जिन्हें इस हाल में पहुँचा दिया गया

वे भूखे थे या खा चुके थे ये कोई नहीं जानता
लेकिन इतना ज़रूर है कि उन्होंने रोटी
पटरी पर बिखरने के लिए तो बिल्कुल नहीं बनायी होगी

इस खाई-अघाई दुनिया के मुँह पर
ये सबसे बड़ा तमाचा है
लहू से सनी उनकी रोटियाँ दुनिया देख रही है।

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शंकरानंद
शंकरानंद जन्म 8 अक्टूबर 1983 नया ज्ञानोदय,वागर्थ,हंस,परिकथा,पक्षधर, आलोचना,वाक,समकालीन भारतीय साहित्य,इन्द्रप्रस्थ भारती,साक्षात्कार, नया पथ,उद्भावन,वसुधा,कथन,कादंबिनी, जनसत्ता,अहा जिंदगी, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर,हरिभूमि,प्रभात खबर आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। कुछ में कहानियां भी। अब तक तीन कविता संग्रह'दूसरे दिन के लिए','पदचाप के साथ' और 'इनकार की भाषा' प्रकाशित। कविता के लिए विद्यापति पुरस्कार और राजस्थान पत्रिका का सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार। कुछ भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी। संप्रति-लेखन के साथ अध्यापन। संपर्क[email protected]