सब माया है, सब ढलती-फिरती छाया है
इस इश्क़ में हमने जो खोया, जो पाया है
जो तुमने कहा है, ‘फ़ैज़’ ने जो फ़रमाया है
सब माया है

हाँ गाहे-गाहे दीद की दौलत हाथ आयी
या एक वो लज़्ज़त नाम है जिसका रुस्वाई
बस इसके सिवा तो जो भी सवाब कमाया है
सब माया है

इक नाम तो बाक़ी रहता है, गर जान नहीं
जब देख लिया इस सौदे में नुक़सान नहीं
तब शम्अ पे देने जान, पतिंगा आया है
सब माया है

मालूम हमें सब क़ैस मियाँ का क़िस्सा भी
सब एक से हैं, ये राँझा भी, ये ‘इंशा’ भी
फ़रहाद भी जो इक नहर-सी खोद के लाया है
सब माया है

क्यूँ दर्द के नामे लिखते-लिखते रात करो
जिस सात समुंदर पार की नार की बात करो
उस नार से कोई एक ने धोखा खाया है?
सब माया है

जिस गोरी पर हम एक ग़ज़ल हर शाम लिखें
तुम जानते हो हम क्यूँकर उसका नाम लिखें
दिल उसकी भी चौखट चूम के वापस आया है
सब माया है

वो लड़की भी जो चाँद-नगर की रानी थी
वो जिसकी अल्हड़ आँखों में हैरानी थी
आज उसने भी पैग़ाम यही भिजवाया है
सब माया है

जो लोग अभी तक नाम वफ़ा का लेते हैं
वो जान के धोखे खाते, धोखे देते हैं
हाँ ठोक-बजाकर हमने हुक्म लगाया है
सब माया है

जब देख लिया हर शख़्स यहाँ हरजाई है
इस शहर से दूर इक कुटिया हमने बनायी है
और उस कुटिया के माथे पर लिखवाया है
सब माया है

इब्ने इंशा की नज़्म 'इक बार कहो तुम मेरी हो'

Book by Ibne Insha: