सभी सुख दूर से गुज़रें
गुज़रते ही चले जाएँ
मगर पीड़ा उमर भर साथ चलने को उतारू है!

हमको सुखों की आँख से तो बाँचना आता नहीं
हमको सुखों की साख से आँकना आता नहीं
चल रहे हैं हम
अभावों को चढ़ाए साँस की खूँटी
हमको सुखों की लाज से तो झाँकना आता नहीं
निहोरे दूर से गुज़रें
गुज़रते ही चले जाएँ
मगर अनबन उमर भर साथ चलने को उतारू है
मगर पीड़ा उमर भर…

हमारा धूप में घर, छाँह की क्या बात जानें हम
अभी तक तो अकेले ही चले, क्या साथ जानें हम
लो पूछ लो हमसे
घुटन की घाटियाँ कैसी लगीं
मगर नंगा रहा आकाश, क्या बरसात जानें हम
बहारें दूर से गुज़रें
गुज़रती ही चली जाएँ
मगर पतझड़ उमर भर साथ चलने को उतारू है
मगर पीड़ा उमर भर…

अटारी को धरा से किस तरह आवाज़ दे दें हम
मेंहदिया चरण को क्यों दूर का अन्दाज़ दे दें हम
चले श्मशान की देहरी
वही है साथ की संज्ञा
बरफ़ के एक बुत को आस्था की आँच क्यों दें हम
हमें अपने सभी बिसरें
बिसरते ही चले जाएँ
मगर सुधियाँ उमर भर साथ चलने को उतारू हैं

सभी सुख दूर से गुज़रें
गुज़रते ही चले जाएँ
मगर पीड़ा उमर भर साथ चलने को उतारू है

हरीश भादानी की कविता 'रोटी नाम सत है'

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हरीश भादानी
(11 जून 1933 - 2 अक्टूबर 2009)

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