सफ़र

‘Safar’, a poem by Neena Sinha

तुम्हें फिर से सहेज लिया है
इक प्रेमपाती की तरह
कहीं किसी दिल के कोने में
अमूल्य, अनिंद्ध किसी संस्मरण सा!

तुम दस्तक ही नहीं देते मन की देहरी पर
बस बरबस यूँ ही चले आते हो क़रीब
जैसे कोई राग श्वाँस में ढलता हो,
मद्धम-सा!

कोई च़राग मन की वेदी पर सुलगता हो
सहर तलक!

ज़िन्दगी की वीथिकाएँ इतनी लम्बी व दुरुह
और तुम इक रौशनी की किरण-सा
गुलज़ार करते
हर लेते हर तम!
तुम दूर देश से आए मलय-सा
मन के प्राँगण, देहरी पर छाँव-सा बस गये!

इक अदा मौसमों ने भी दिखायी
हर नक़्श व निशाँ बदल डाले
ज़िद थी कि आज़माया जाए
बहुत दूर किसी अनजाने अनचीन्हे मोड़ तलक
ले जाकर, फिर
लौटने का वादा लिए उसी मंज़र
उसी मोड़ पर
जहाँ से अनहद की यात्रा पर दो क़दम
हम साथ चले थे!

मैं फिर सफ़र पर मुतमईन हूँ, कि
राहें जानी पहचानी सी लगती हैं!
फ़क़त हर उस मोड़ से नावाक़िफ़ हूँ
जो फिर झंझावात-सा
यकलख़्त गुज़र जाए!

इक यक़ीन का पैरहन है
और, पाँव डगमगाते हैं, कि
यहाँ इकरस, समरस फ़िजाँ का तो
कोई मौसम का वादा नहीं रहा!
अनदेखे , अनजाने रहगुज़र पर
इक पग हौले से
और
मन के विश्वास की लौ
बस बरबस यूँ ही काँप रही…