वो रातों की मस्ती
लम्हों का ठहर जाना
लौटा के वो ज़माने
तू मेरी शब को सहर कर

नज़्में उदास फिर रहीं
अफ़साने सिसक रहे
किसी रोज़ बेख़ुदी में
मेरे मिसरों को ग़ज़ल कर

लहरों में डूबकर कर ही
पाया है इक सुकून
अब जाके ऐ समन्दर!
साहिल को भँवर कर

सोया है चाँद मेरा
मेरे शाने पर रख के सर
ऐ रात! यूँ न भाग
आहिस्ते चला कर

जब-जब लिखा है नाम तेरा
लहरें मिटा गयीं
अब लिख दिया है नाम ‘कपिल’
उस आख़िरी लहर पर ….

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