एक दिन चुपचाप,
अपने आप
यानी बिन बुलाए,
तुम चले आए;
मुझे ऐसा लगा
जैसे जगा था रात भर
इसकी प्रतीक्षा में;
कि दोनों हाथ फैलाकर
तुम्हें उल्लास से खींचा;
सबेरे की किरन ने
हर कुसुम को हास से सींचा!

एक दिन चुपचाप
अपने आप
यानी बिना कारण,
प्यार के दो-एक बंधन
ध्यान में लाए-न-लाए
कौन जाने;
कहा तुमने, अब चलूँगा,
फूल खिलते हैं न जाने
किस सरोवर में
कि मेरे चरण पर चढ़ते,
रो रहे हैं कहीं बालक यों
कि मेरी गोद में बढ़ते;
कि मैं साहित्य हूँ, तेरा नहीं हूँ,
मैं विशद विस्तार हूँ, घेरा नहीं हूँ!

मैं सभी समझा नहीं;
लेकिन लगा जैसे कि
कोई बात सच्ची है।
कहा मैंने, अकेले किसलिए
लाचार घूमोगे?
चलो मैं साथ हूँ,
तुम जिस घड़ी विंध्या चढ़ोगे,
मैं तुम्हारी गति बनूँगा,
बहुत यदि बहते दिखोगे तुम
तुम्हारी यति बनूँगा!
तुम अकेले किसलिए,
हम दो;
कि दोनों विंध्य-शिखरों पर चढ़ेंगे;
मातृ-मन्दिर के लिए
छोटी-बड़ी जैसी बने मूरत
मगर मिलकर गढ़ेंगे;
मैं कहूँ किस भाँति
मैं तेरा नहीं हूँ,
मैं विशद विस्तार
जाने हूँ, नहीं हूँ;
किन्तु निश्चित है कि मैं घेरा नहीं हूँ!
और तुमने हाथ फैलाकर मुझे
उल्लास से खींचा,
कि अब के सूर्य किरनों ने
किरन की शक्ति के बाहर
जगत को हास से सींचा।