जेठ की भरी दोपहर सबकी नज़रों से छुपाकर सुखाती हूँ… मन!

उल्टा-सीधा, अन्दर-बाहर, ऊपर-नीचे सब तरफ़, रूबिक क्यूब जैसा, हर लेयर पर, हर रंग पर और फिर निश्चिन्त सहेजकर रख देती हूँ ताक़ पर..!

तीन जुलाई की दोपहर अचानक बहते हैं रंग और फिर सहेजा-समेटा सब कुछ भीग जाता है। अपने सफ़ेद दुपट्टे से पोंछती हूँ मैं सारे रंग तुम्हारी यादों के और भीगे मन के भी।

मन सीला है, तुम्हारी आँखों की धूप नहीं है, है तो बस केवल बदलियाँ जो जम गई हैं आसमान में।

मैं घबराकर देखती हूँ सीले गीले मन को, जिसका सर्दियों में जमकर ठिठुर जाना तय है। उसे तुम्हारी आवाज की आँच भी तो नहीं मिलेगी।

…पर अगर बचा रहा तो देखेगा एक और जेठ और गुज़रेगा फिर उन्हीं दोपहरों से, जिनमें जी लगाने को तीन क्यूब आइस और अलसाता सन्नाटा… जिनमें बेगम अख़्तर गाती हैं कोई ठुमरी…

सुनो, आज फिर दूर कोई सुनता है-

एरी सखी मोरे पिया घर ना आये…

[जुलाई 22, 2019]

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