समर्पण

रात्रि विश्राम हेतु बिस्तर पर लेटने से पूर्व यामा ने नन्हे से पुत्र को स्नेहवत चुंबन दिया। तभी उसका ध्यान पुत्र के बगल में लेटे पति पुरु की ओर गया जो मंद मुस्कान के साथ यामा को ही निहार रहे थे। यामा ने उनके माथे पर भी एक उष्ण चुम्बन अंकित कर दिया। इस प्रेम-प्रतीक को पा पुरु गदगद हो उठे।

पुरु- “तुम कैसे जान गई कि हम भी जरूरतमंद हैं?”

यामा- “आपको देखकर मन में आकांक्षा उठ गई बस।”

पुरु- “तुम्हारी आकांक्षा भी तो मेरे मन को समझ कर ही उठी है।”

यामा- “क्या लगता है, आपको कितना समझती हूँ मैं?”

पुरु- “जितना मेरा विस्तार है उतना।”

यामा- “नहीं ज्ञात है मुझे आपका विस्तार कहाँ तक है!”

पुरु- “मेरा विस्तार… मेरा विस्तार ना तो किसी खेत की तरह चौरस है और ना ही आकाश की तरह असीम। मेरा विस्तार तो उस परिधि तक सीमित है जिसका केन्द्रबिन्दु तुम हो।”

यामा- “सत्य ही तो है कि मैं बिंदुमात्र हूँ, मेरा विस्तार तो आप ही हैं।”

पुरु- “…किन्तु मैं वहीं तक विस्तृत हूँ जहाँ तक तुम्हारी संभावनाएँ हैं।”

वातावरण प्रेम की सुगंधि से मदित हो चुका था…।