सम्भावनाएँ अनंत थीं
अगर रुक पाते…

जैसे तुम मेरे चेहरे पे गिर आये बालों को कान के पीछे ‘टक’ कर देते, हल्के हाथों से
जैसे तुम कुछ कहते, घुमा देते मेरी उँगली की अंगूठी
जैसे मैं तुम्हारी कत्थई आखों में देखते हुए मिस कर देती, तुम्हारा कहा कुछ, और कहती- “फिर से कहो!”
जैसे मैं तुम्हें बता पाती, कि काले रंग की स्वेट शर्ट पहने, तुम्हारे माथे पे उभर आई पसीने की बूंदें, कितना ऑसम बना रही थीं तुम्हें!

लेकिन,
मैं उठ आई
तुम्हें मेज पर ही छोड़कर,
हर सम्भावना को नकार कर

क्योंकि, मैं चाहती थी कि तुम्हें हमेशा ऐसा ही देखूँ!

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