सुनते थे कि साहित्यकार की व्यापक दृष्टि आधारभूत मानवीय मूल्यों पर रहती है और उन्हें समग्र विश्व के परिप्रेक्ष्य में देखती-परखती है। वह तात्कालिकता की रौ में नहीं बहता बल्कि बुनियादी सवालों से जूझता है और जीवन की सामान्यता में से विशिष्ट भावानुभूतियों का चयन करके उन्हें सम्वेदना के वृहद् धरातल पर प्रतिष्ठित करता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में यदि हम अपने समसामयिक साहित्य पर दृष्टि डालते और वस्तुपरक भाव से उसका विश्लेषण करते हैं तो हमें गहरी निराशा होती है। लगता है, आज वे सारी मान्यताएँ बिखर गई हैं। वैशिष्ट्य का वह आग्रह टूट गया है और साहित्यकार भी अन्य बुद्धिजीवियों की तरह जनसामान्य के उसी धरातल पर उतर आया है जहाँ केवल प्रतिक्रियाओं का लहराता-उफनता सागर है, आवेश में बँधी हुई मुट्ठियाँ हैं और अज़हद बेचैनी और दर्द से सीमा की ओर निहारती हुई अगणित आँखें हैं।

यहाँ तक मैं जानता हूँ यह स्थिति केवल हिन्दी की नहीं बल्कि कमोबेश देश की उन सभी भाषाओं की है जिनका समूचा समसामयिक साहित्य भारत पर चीनी आक्रमण की अनुगूँज बनकर तड़प उठा है। जिनके अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर विचरने वाले और एक विश्व, एक राज्य का स्वप्न देखने वाले सृजनशील मनीषी और चिंतक भी राष्ट्रीयता की परिधि में सिमट आए हैं और मानवीय मूल्यों और समाजवादी समाज-रचना के उच्चादर्शो से प्रभावित कृती साहित्यकार भी ‘देश की जय बोल प्यारे’ जैसी रचनाओं का सृजन कर रहे हैं।

प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों हुआ? क्यों कल तक राजनीति को साहित्य से अलग मानने वाले साहित्यकार अपनी रचनाओं में उन्हीं राजनीतिक नारों का प्रचार करने लगे जिन्हें शायद सामान्य और शांतिपूर्ण स्थिति में वे पढ़ना तो क्या, सुनना भी पसंद न करते? उत्तर है, जन-चेतना का तीव्र भावावेग। वह जन-चेतना जो सारे सतही विवादों की चट्टानों को फोड़कर अचानक ऊपर उभर आयी है और सारे समाज पर छा गई है। आख़िर समाज से ही तो साहित्य जीवन-रस ग्रहण करता है। वह समाज जब एक मित्र कहे जाने वाले देश के विश्वासघातपूर्ण आक्रमण से विक्षुब्ध हो उठा तो उसकी प्रतिक्रिया से बचना, साहित्य के लिए बचना कैसे सम्भव था? और एकमात्र इसी सत्य ने सिद्ध कर दिया कि हम पहले भारतीय हैं, विचारक या चिंतक बाद में। हम विश्वबंधुत्व के आदर्शों की बात करते हैं, पर अपने आत्माभिमान और स्वाधीनता के मूल्य पर नहीं। जहाँ सच्चाई का हनन होता है, जहाँ न्याय का गला घोंटा जाता है और जहाँ स्वतंत्रता के मिज़ाज को दबाया जाता है, वहाँ अपनी अहिंसा की सारी परम्परा और पृष्ठभूमि के बावजूद हम ख़ामोश नहीं बैठ सकते और हम क्या, शायद विश्व के किसी भी देश के साहित्य में ऐसी मिसाल न मिले कि कोई ऐसी तीखी प्रतिक्रिया हुई और वहाँ का साहित्य उससे निस्संग रह गया।

यद्यपि यह सच है कि प्रतिक्रिया का साहित्य कभी स्थायी नहीं होता। मगर यह भी सच है कि ऐसी संकटकालीन परिस्थिति में साहित्यकार इन प्रतिक्रियाओं से निर्लिप्त नहीं रह पाता। जिस तरह जीवन की शांतिपूर्ण सुविधाओं और साधनों को महान् और आवश्यक मानते हुए भी राष्ट्रों के सामने ऐसे अवसर आ जाते हैं कि वे युद्ध-सामग्री के निर्माण में लग जाएँ, उसी तरह जीवन के शाश्वत और बुनियादी मूल्यों के महत्त्व को प्रतिपादित करने वाला साहित्यकार भी ऐसी घड़ियों में तात्कालिक साहित्य का सृजन करने लगता है। समाज का एक अंग और जन-चेतना का सहयोगी होने के नाते वह ख़ुद भी भावावेश में बह जाता है। यह बात दूसरी है कि वह अनिश्चित रूप से आम जनता की तरह गंतव्य का ध्यान किए बिना नारे लगाता नहीं चला जाता बल्कि अपने सहज संतुलन और विवेक द्वारा अपनी दिशा और गंतव्य के विषय में सोचता है। यदि वह ऐसा न करे तो बुद्धिजीवी कहलाने का उसका हक़ क़ायम नहीं रह सकता।

आज कमोबेश स्थिति वही है यानी साहित्यकार जनता को या तो प्रताप, शिवाजी और रानी लक्ष्मीबाई की याद दिला-दिलाकर तलवारें सूँतने की प्रेरणा दे रहा है या अपनी शांतिप्रियता का हवाला देकर आक्रमणकारी की बर्बरता और विश्वासघात को गालियाँ सुना रहा है। जैसा कि मैंने पहले कहा, ये सच है कि एक अवधि तक इनका कोई महत्त्व होता है। उदाहरण के लिए, यदि हमारी सीमाओं पर युद्ध चलता रहता तो शायद इन नारों-भरे साहित्य की आवश्यकता भी बढ़ती रहती, क्योंकि ऐसा साहित्य और चाहे साहित्य की श्रीवृद्धि न करे मगर इतना तो करता है कि वह उत्तेजना ओर आवेशग्रस्त जनमत के शौर्य को उद्दीप्त करके उसे तात्कालिक स्थिति का सामना करने योग्य बनाता है, उसे बलिदान और उत्सर्ग की भावना से पूर्ण करता है और उस अवधि विशेष के भीतर प्राणों में संचित ज्वाला को चतुर्दिक फैलाकर राष्ट्र-सेवा और राष्ट्र-रक्षा के लिए उत्प्रेरणा देता है, किंतु केवल उसी सीमित अवधि तक। उसके बाद भावुकता का यह ज्वार उतर जाने पर ‘हिमालय हमारा है, ये देश हमारा है, ये हमारी पवित्र धरती है, हम इस पर अपनी जान क़ुर्बान कर देंगे और हम ख़ून की गंगा बहा देंगे’ आदि नारों का कोई अर्थ नहीं रह जाता, बावजूद इसके कि वे कविता की तुकों में चाहे कितने ही फ़िट क्यों न बैठते हों। ज़ाहिर है कि अत्यधिक भावुकता किसी राष्ट्र की शक्ति नहीं, कमज़ोरी ही होती है। इसलिए बेहतर हो कि ‘हिमालय हमारा है’ जैसी बातें, जिन्हें यों ही हर व्यक्ति जानता-समझता और महसूस करता है, हम राजनीतिज्ञों के लिए छोड़कर आधारभूत प्रश्नों का मनन करें। ऐसे प्रश्न जो किसी राष्ट्र के चरित्र का निर्माण करते हैं और न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य के भी सारे आसन्न संकटों का सामना करने योग्य बनाते हैं।

आज जबकि अल्पकाल के ही लिए सही, युद्ध रुक गया है और हमारा राष्ट्र सीमा-रक्षा और सम्भावित आक्रमण को रोकने की तैयारियों में लगा है, साहित्य और साहित्यकार का दायित्व भी बँट जाता है। उसको अब जनता को हिमालय की भौगोलिक स्थिति नहीं समझानी है और न अपनी शांतिप्रियता और अतीव राग अलापना है, बल्कि एक ऐसे जीवन-दर्शन की स्थापना करनी है जिसमें स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों के संरक्षण की ललक हो, जिसमें राष्ट्रीय एकता के साथ ही विश्व-बंधुत्व और शांति के साथ आत्माभिमान की रक्षा का बोध भी हो। मगर ऐसा दर्शन परिस्थिति के सत्य को पचाकर अनुभूत सत्य बनाने से ही प्राप्त हो सकता है। तभी जनता में वह अविचल और अडिग आत्मविश्वास पैदा होगा जो विषम से विषम परिस्थितियों में भी उसे अपनी विजय के प्रति अनाश्वस्त न होने दे।

इस संदर्भ में मुझे चर्चिल का वह ऐतिहासिक भाषण याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था, “हमारा लंदन चाहे राख का ढेर या खंडहर रह जाए, हमें मंज़ूर है, किंतु लंदनवासी चुपचाप पराधीनता स्वीकार कर लें, यह हमें हरगिज़-हरगिज़ मंज़ूर नहीं।” इसी भाषण में आगे चलकर उन्होंने कहा था, “हमारे सैनिकों में पराक्रम की कमी नहीं, हमारे पास शस्त्रों की कमी नहीं, हमारी जनता में संकल्प की कमी नहीं, तो मैं कोई वजह नहीं देख पाता जिसके कारण हमारी विजय न हो।” निश्चय ही गहरा आत्मविश्वास झलकता है इन शब्दों में।

और निश्चय ही चर्चिल के ये उद्गार ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं। मगर क्या ये केवल अकेले प्रधानमंत्री चर्चिल के उद्गार थे? क्या ये इंग्लैंड की उस सारी जनता के उद्गार नहीं थे जिसने भयंकर संकट के समय भी अपने औसान क़ायम रखे और क्या जनता में इस तरह की स्फूर्ति और मनोबल पैदा करने में वहाँ के साहित्य का हाथ नहीं रहा? अंग्रेज़ी साहित्य के विद्यार्थी जानते हैं कि अंग्रेज़ी साहित्यकारों की परम्परा केवल साहित्य-सृजन तक सीमित नहीं रही बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने स्वयं राइफ़लें और बन्दूक़ें सम्भालकर दुश्मन का मुक़ाबला भी किया है। यहाँ तक कि लॉर्ड बायरन और रूपर्ट ब्रक जैसे प्रतिभाशाली कवियों की तो मृत्यु भी युद्ध के मैदान में हुई थी।

कहने का तात्पर्य यह है कि आज अपने दायित्वों के विश्लेषण का और यह सोचने का समय आ गया है कि अगर साहित्य को संकट का सामना करने योग्य बनाना है तो साहित्यकार को एक जीवन-दर्शन अपनाना पड़ेगा, और वह जीवन-दर्शन घृणा और युद्ध-प्रचार का न होकर ऐसे शाश्वत मूल्यों का होगा जिसमें शक्ति होगी, पर दया-रहित नहीं, अहिंसा होगी पर साहस-शून्य नहीं, प्रेम और विश्व-बंधुत्व होगा पर परावलम्बन नहीं।

ऐसा साहित्य बिसरती-छितराती जनशक्ति को एक सूत्र में बाँधकर दिशा देने वाला तो होगा ही, साथ ही स्थायी भी होगा।

[1963 में प्रकाशित]
दुष्यन्त कुमार का लेख 'साहित्य सत्ता की ओर क्यों देखता है'

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दुष्यन्त कुमार
दुष्यंत कुमार त्यागी (१९३३-१९७५) एक हिन्दी कवि और ग़ज़लकार थे। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ ४२ वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की।

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