‘भारत की एकता का निर्माण (27 भाषण)’ से

गांधी जी की हत्या के एकदम बाद

दिल्ली, 30 जनवरी, 1948

भाइयो और बहनो,

आपने मेरे प्यारे भाई पं० जवाहरलाल नेहरू का पैग़ाम सुन लिया। मेरा दिल दर्द से भरा हुआ है। क्या कहूँ क्या न कहूँ? ज़बान चलती नहीं है। आज का अवसर भारतवर्ष के लिए सबसे बड़े दुःख, शोक और शर्म का अवसर है। आज चार बजे मैं गांधी जी के पास गया था और एक घण्टे तक मैंने उनसे बात की थी। वह घड़ी निकालकर मुझसे कहने लगे कि मेरा प्रार्थना का समय हो गया है। अब मुझे जाने दीजिए। तो वह भगवान के मन्दिर की तरफ़ अपने हमेशा के समय पर चलने के लिए निकल पड़े। तब मैं वहाँ से अपने मकान की तरफ़ चला। मैं मकान पर अभी पहुँचा नहीं था कि उतने में रास्ते में एक भाई मेरे पास आया। उसने कहा कि एक नौजवान हिन्दू ने गांधी जी के प्रार्थना की जगह पर जाते ही अपनी पिस्तौल से उन पर तीन गोलियाँ चलायीं, वह वहाँ गिर पड़े और उनको वहाँ से उठाकर घर में ले जाया गया है। मैं उसी वक़्त वहाँ पहुँच गया। मैंने उनका चेहरा देखा। वही चेहरा था। वैसा ही शान्त चेहरा था, जैसा हमेशा रहता था। ठीक वही चेहरा था। और उनके दिल में दया और माफ़ी के भाव अब भी उनके चेहरे से प्रकट होते हैं। आस-पास बहुत लोग जमा हो गए। लेकिन वह तो अपना जो काम उन्हें करना था, उसे पूरा करके चले गए!

पिछले चन्द दिनों से उनका दिल खट्टा हो गया था और आप जानते हैं कि आख़िर उन्होंने उपवास भी किया। उपवास में चले गए होते, तो अच्छा होता। लेकिन उनको और भी काम देना था तो रह गए। पिछले हफ़्ते में एक दफ़ा और एक हिन्दू नौजवान ने उनके ऊपर बम फेंकने की कोशिश की थी। उसमें भी वह बच गए थे। इस समय पर ही उनको जाना था। आज वह भगवान के मन्दिर में पहुँच गए! यह बड़े दुःख का, बड़े दर्द का समय है, लेकिन यह ग़ुस्से का समय नहीं है। क्योंकि अगर हम इस वक़्त ग़ुस्सा करें, तो जो सबक़ उन्होंने हमको ज़िन्दगी-भर सिखाया, उसे हम भूल जाएँगे। और कहा जाएगा कि उनके जीवन में तो हमने उनकी बात नहीं मानी, उनकी मृत्यु के बाद भी हमने नहीं माना। हम पर यह धब्बा लगेगा। तो मेरी प्रार्थना है कि कितना भी दर्द हो, कितना भी दुःख हो, कितना भी ग़ुस्सा आए, लेकिन ग़ुस्सा रोककर अपने पर क़ाबू रखिए। अपने जीवन में उन्होंने हमें जो कुछ सिखाया, आज उसी की परीक्षा का समय है। बहुत शान्ति से, बहुत अदब से, बहुत विनय से एक-दूसरे के साथ मिलकर हमें मज़बूती से पैर ज़मीन पर रखकर खड़ा रहना है। आप जानते हैं कि हमारे ऊपर जो बोझ पड़ रहा है, वह इतना भारी है कि क़रीब-क़रीब हमारी कमर टूट जाएगी। उनका एक सहारा था और हिन्दुस्तान को वह बहुत बड़ा सहारा था। हमको तो जीवन-भर उन्हीं का सहारा था। आज वह चला गया! वह चला तो गया, लेकिन हर रोज़, हर मिनिट वह हमारी आँखों के सामने रहेगा! हमारे हृदय के सामने रहेगा! क्योंकि जो चीज़ वह हमको दे गया है, वह तो कभी हमारे पास से जाएगी नहीं!

कल चार बजे उनकी मिट्टी तो भस्म हो जाएगी, लेकिन उनकी आत्मा तो अब भी हमारे बीच में है। अभी भी वह हमें देख रही है कि हम लोग क्या कर रहे हैं। वह तो अमर है। जो नौजवान पागल हो गया था, उसने व्यर्थ सोचा कि वह उनको मार सकता है। जो चीज़ उनके जीवन में पूरी न हुई, शायद ईश्वर की ऐसी मर्ज़ी हो कि उनके द्वारा इस तरह से पूरी हो। क्योंकि इस प्रकार की मृत्यु से हिन्दुस्तान के नौजवानों का जो कॉनशंस (अन्तरात्मा) है, जो हृदय है, वह जाग्रत होगा, मैं ऐसी आशा करता हूँ। मैं उम्मीद करता हूँ और हम सब ईश्वर से यह प्रार्थना करेंगे कि जो काम वह हमारे ऊपर बाक़ी छोड़ गए हैं, उसे पूरा करने में हम कामयाब हों। मैं यह भी उम्मीद करता हूँ कि इस कठिन समय में भी हम पस्त नहीं हो जाएँगे, हम ना-हिम्मत भी नहीं हो जाएँगे। सब को दृढ़ता से और हिम्मत से एक साथ खड़ा होकर इस बहुत बड़ी मुसीबत का मुक़ाबला करना है और जो बाक़ी काम उन्होंने हमारे ऊपर छोड़ा है, उसे पूरा करना है। ईश्वर से प्रार्थना कर, आज हम निश्चय कर लें कि हम उनके बाक़ी काम को पूरा करेंगे।

गांधी जी की शोक-सभा में

रामलीला मैदान, दिल्ली, 2 फ़रवरी 1948

सदर साहब, बहनो और भाइयो,

जब दिल दर्द से भरा होता है, तब ज़बान खुलती नहीं है और कुछ कहने को दिल नहीं होता है। इस मौक़े पर जो कुछ कहने को था, भाई जवाहरलाल नेहरू ने कह दिया, मैं क्या कहूँ? जब से गांधी जी हिन्दुस्तान में आए तब से, या जब मैंने ज़ाहिर जीवन शुरू किया तब से, मैं उनके साथ रहा हूँ। अगर वे हिन्दुस्तान न आए होते, तो मैं कहाँ जाता और क्या करता, उसका जब मैं ख़याल करता हूँ तो एक हैरानी-सी होती है। तीन दिन से मैं सोच रहा हूँ कि गांधी जी ने मेरे जीवन में कितना पल्टा किया और इसी तरह से लाखों आदमियों के जीवन में उन्होंने किस तरह से पल्टा किया? सारे भारतवर्ष के जीवन में उन्होंने कितना पल्टा किया। यदि वह हिन्दुस्तान में न आए होते तो राष्ट्र कहाँ जाता? हिन्दुस्तान कहाँ होता? सदियों से हम गिरे हुए थे। वह हमें उठाकर कहाँ तक ले आए? उन्होंने हमें आज़ाद बनाया। उनके हिन्दोस्तान आने के बाद क्या-क्या हुआ और किस तरह से उन्होंने हमें उठाया, कितनी दफ़ा किस-किस प्रकार की तकलीफ़ें उन्होंने उठायीं, कितनी दफ़े वह जेलख़ाने में गए और कितनी दफ़े उपवास किया, यह सब आज ख़याल आता है। कितने धीरज से, कितनी शान्ति से वह तकलीफ़ें उठाते रहे, और आख़िर आज़ादी के सब दरवाज़े पार कर हमें उन्होंने आज़ादी दिलवायी।

लेकिन इसके बाद क्या हुआ? इसके बाद ख़ुद हमारे एक नौजवान ने उनके बदन पर गोली चलाने की हिम्मत की। यह कितनी शरम की बात है! उसने गोली किसके ऊपर चलायी? उसने एक बूढ़े बदन पर गोली नहीं चलायी, यह गोली तो हिन्दुस्तान के मर्म स्थान पर चलायी गई है! और इससे हिन्दुस्तान को जो भारी ज़ख़्म लगा है, उसके भरने में बहुत समय लगेगा। बहुत बुरा काम किया! लेकिन इतनी शरम की बात होते हुए भी हमारे बदक़िस्मत मुल्क में कई लोग ऐसे हैं, जो उसमें भी कोई बहादुरी समझते हैं, कोई ख़ुशी की बात समझते हैं। जो ऐसे पागल लोग हैं, वे हमारे मुल्क में क्या नहीं करेंगे? और जब गांधी जी के तन पर गोली चल सकती है, तो आप सोचिए कि कौन सलामत है? और किस पर गोली नहीं चल सकती है?

तो क्या गांधी जी ने हिन्दुस्तान को जो आज़ादी दिलवायी, इसी काम के लिए? अगर हम इसी रास्ते पर चलेंगे, तो कहाँ जाकर बैठेंगे? हमारे पास क्या बाक़ी बच रहेगा? क्या हम आज़ादी को हज्म कर सकेंगे? दुनिया में हमारी क्या हालत होगी? जब गांधी जी ने दिल्ली में यह अन्तिम उपवास किया तो मैं तो उस रोज़ इधर से चला गया था। लेकिन मुझे बहुत शक था कि इस समय वह उपवास में से बचेंगे कि नहीं। और जब वह उठे और उपवास छूट गया तो बहुत ख़ुशी हुई। लेकिन यह ख़ुशी कितने दिन की रही? और कौन कह सकता है कि उपवास छूटने से फ़ायदा हुआ, जब पीछे से उन्हें गोली से मरना हुआ। अगर वह उपवास से मरते, तो भी हमको बहुत शरम होती। लेकिन गोली से मरे, तो कोई थोड़ी शरम की बात नहीं है। सारी दुनिया में हमारा मुँह काला हो गया है।

हाँ, यह कह सकते हैं कि यह काम एक पागल आदमी ने किया। लेकिन मैं यह काम किसी अकेले पागल आदमी का नहीं मानता। इसके पीछे कितने पागल हैं? और उसको पागल कहा जाए कि शैतान कहा जाए, यह कहना भी मुश्किल है। लेकिन जो लोग उसके पीछे हैं, उनको और बढ़ने दें, तो मुल्क में क्या नहीं आ सकता है। यह आप लोगों के सोचने की बात है।

जिसके पास हुकूमत है, उसकी तो है ही। लेकिन जब तक आप लोग अपने दिल साफ़ कर हिम्मत से इसका मुक़ाबला नहीं करेंगे, तब तक काम नहीं चलेगा। मगर उसका मतलब यह नहीं है कि आप क़ानून अपने हाथ में लेकर उसको सज़ा देने लग जाएँ। तब तो उससे भी बुरा होगा। क्योंकि तब तो जैसे वह पागल हो गया, वैसे ही हम भी पागल बन जाएँगे। तो क़ानून में हस्तक्षेप किए बिना हमें इन चीज़ों का विरोध करना चाहिए। अगर हमारे घर में ऐसे छोटे बच्चे हों, हमारे घर में ऐसे नौजवान हों, जो उसी रास्ते पर जाना पसन्द करते हों, तो उनको कहना चाहिए कि यह बहुत बुरा रास्ता है और तुम हमारे साथ नहीं रह सकते। इस तरह साफ़ बात न करें, तो ये चीज़ें बढ़ती जाएँगी। ऐसे मौक़ों पर इसी तरह लाखों आदमी तो ज़रूर जमा हो जाते हैं, लेकिन चन्द दिनों के बाद अगर असल चीज़ भूल गई, तो फिर उससे भी बुरा नतीजा आएगा।

तो गांधी जी ने कोशिश करके हमको आज़ादी तो दिलवायी, लेकिन उसके बाद जिसने आज़ादी दिलवायी, उसको भी हमारे सामने मरना पड़ा। यह बहुत बुरा काम किया गया। जिन लोगों ने यह काम किया, गवर्नमेंट की तरफ़ से उसकी पूरी खोज की जाएगी। लेकिन सरकार की इस कोशिश में, आपको साथ देना हो और अपना धर्म बजाना हो, तो आपको इस चीज़ के प्रति अपनी ना-पसन्दगी और घृणा बतानी चाहिए। जब मैं इधर आ रहा था तो एक भाई ने मेरे पास चिट्ठी भेजी कि कम्युनिस्टों का एक जुलूस निकला, उस जलूस में वे कहते थे कि हम बदला लेंगे। यदि फिर भी हम इस ढंग से काम करेंगे तो माना जाएगा कि गांधी जी की बात ज़िन्दगी-भर तो हमने सुनी नहीं, मानी नहीं, लेकिन मरने के बाद भी उसे नहीं माना।

बदला लेना हमारा काम नहीं है। इस तरह से बदला नहीं लिया जाता है। वैसा किया गया तो हम लोग ग़लत रास्ते पर चले जाएँगे। तो न किसी को मारना, न किसी के घर पर हल्ला करना और न किसी को पीटना। लेकिन यदि आपको कोई चीज़ मालूम हो तो तुरन्त हुकूमत को बता देना चाहिए कि इस प्रकार लोग काम करते हैं। तो इन लोगों को रोकना चाहिए कि वे ऐसा काम न करें। जो बुरा काम करता है, उसको रोकना, उसको ठीक तरह से रोकने की कोशिश करना हमारा काम है। लेकिन इस तरह से कोई बदला लेने की बात करे, तो उसकी बात हमें नहीं सुननी चाहिए। आज हम लोगों को इतनी सालों की कोशिश के बाद जो कुछ मिला है, गांधी जी ने जो कुछ दिलवाया है, वह चीज़ हमें फेंक नहीं देनी है। यह थाती गांधी जी हमारे पास रख गए हैं। इसको हमें ठीक तरह से चलाना है। इसके लिए हमें गांधी जी के बताए हुए मार्ग को समझकर उस रास्ते पर चलने की कोशिश करना है। यही हमारा कर्तव्य है। हम ईश्वर से माँगें कि वह हमें उस रास्ते पर चलने की शक्ति दे।

जवाहरलाल नेहरू का आज़ादी पर दिया गया भाषण 'भाग्य से सौदा'

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सरदार वल्लभ भाई पटेल
सरदार वल्लभ भाई पटेल (31 अक्टूबर, 1875 - 15 दिसंबर, 1950) भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। भारत की आजादी के बाद वे प्रथम गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री बने। बारडोली सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहे पटेल को सत्याग्रह की सफलता पर वहाँ की महिलाओं ने सरदार की उपाधि प्रदान की। आजादी के बाद विभिन्न रियासतों में बिखरे भारत के भू-राजनीतिक एकीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाने के लिए पटेल को भारत का बिस्मार्क और लौह पुरूष भी कहा जाता है।

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