साथ समझते हो?

‘Sath Samajhte Ho Tum’, a poem by Rag Ranjan

जो रोज़ विदा लेकर लौट आता है
कभी-कभी कई बार एक ही दिन में
उसने दूर जाना सीखा ही नहीं

तुम सूरज से रहना… रोज़ लौट आना
बादलों के बीच भी विश्वास से उष्म
रातों के पर्दे में रहना उम्मीद-से गुम

साँस सदा साथ रहती है
जाएगी तो सब ले जाएगी

साथ, समझते हो तुम?