सत्ता की अभिलाषा

सत्ता की अभिलाषा में,
रणभेरी अब गूँज उठी है।
शंखनाद का नाद बज रहा,
सभी दिशायें गूँज रही हैं।
लहूलुहान होते नर-नारी ,
नारों का अब सम्मान जा रहा।
कोई किसी का नहीं इस रण में,
जाति-धर्म ऊपर है सब में।
मुद्दों की अब बात नहीं है,
कर्मों की सौगात नहीं है।
अप्रत्यक्ष अब प्रत्यक्ष का रूप ले रहा,
भूतकाल वर्तमान पर भारी।
भविष्य की तो बात ही नहीं है ,
कौन करेगा, कैसे होगा
सार्थक कोई प्रयास नहीं है।

‘तुम मेरे हो’ हर कोई अब गा यह रहा,
जीवन अब नहीं तुम बिन,
ऐसा वह बतला अब रहा।
क्या करे यह मणि जो सोचे,
घोर निराशा चहुओर है घेरे,
चारो खाने चित्त बैठे,
कोने-कोने हम जोह रहे,
कहीं उम्मीद की किरण नहीं है,
संस्कार विहिन यह राजनीति नई है।
किसानों का तुम ऋण माफ करोगे,
फिर तुम जात-पात की बात करोगे।
रोजगार के सपने अब,
तुम फिर हर रोज दिखाओगे।
कहीं समृद्धि की बात करोगे,
कहीं पर धूल चटाओगे।
माया के तुम साथी हो,
मायापति कहलाओगे।
रोज हवा में महल बनेंगे,
और सोने का सिंहासन होगा।
अगली बार तुम मंगल यान से,
फिर चुनाव में आओगे।
मैं मणि अब मान गया हूँ,
तुम फिर सत्ता मे आओगे।