सत्य… निर्बन्धित सा

‘Satya Nirbandhit Sa’, a poem by Manjula Bist

सत्य,
जल रूप में वहीं बह रहा था
जहाँ उसे चख छोड़ा था…
सम्भवतः अंधकार में पुतलियाँ विस्तार पा गयी थीं
जो गीले तलुओं से.. जल को खोजने में व्यस्त रहीं।

अनुभवी मल्लाह को भी कहाँ ज्ञात था
कि पदार्थ बहा ले जाने के विचार से;
किसी बिंदु पर जल-धारा भी तीव्र न हुई थी
वह तो बस स्वयं के भीतर कहीं सध रही थी!

आह!
क्या क्षण रहा था वह..
जब जल-धारा को ज्ञात हुआ कि
विभिन्न बिंदुओं पर
उसकी देह ही यात्रा करती रही… वह नहीं!
वह तो हमेशा वहीं उपस्थित रही थी
जहाँ उसे होना था!

विभावरी तले
चाँद व सूरज ने… जब अपनी दिशा बदली थी
एक स्वप्न… जब पलकों से अनायास छूट गया था
तब भी सत्य… जल-धारा सा निर्बन्धित था!
वहीं था… वहीं तो था!!
जहाँ उसे चख छोड़ा था…

सत्य को पाकर देह अनायास जड़वत यूँ हुई
जैसे तितली के दो कोमल पंख रह जाते हैं
अनायास अधखुले…
अंतिम श्वास छोड़ते हुए!