कविता संग्रह ‘लौटा है विजेता’ से

झुनिया को चर्राया
इज्जत का सौख
बड़के मालिक की
उतरन का कुरता
देखने में चिक्कन
बरतने में फुसफुस
नाप में भी छोटा
कंधे पर
छाती पर
कसता
बड़ी जिद और जतन से
महंगू को पहनाया।
मुश्किल है महंगू को
अब सांस लेना भी।

झुनिया ने महंगू की
एक नहीं मानी।
सांस वांस रखी रहे
इज्जत की ठानी।
एड़ी से चोटी तक
अंगों पर ढांप ली
चादर पुरानी
जीते जी पगली ने
ओढ़ लिया कफ़न
कोठरी में घुस कर
कुण्डी चढ़ा ली।

देहरी के पार अब
झांकेगी न भूलकर
कोठरी के भीतर का
राजपाट देखेगी
मलकिन की तरह खुद
पियराती जाएगी
जाने इस इज्जत को
ले के क्या पायेगी।

इज्जत की नाप
बहुत छोटी है झुनिया
झरोखा न खिड़की
न दिन है न दुनिया
अपने कद को तो देख जरा
छत से भी ऊंचा है
कितना सिकोड़ेगी हाथ पांव अपने
गर्दन को पैरों तक
कैसे झुकाएगी, कब तक दोहराएगी
सीधी सतर पीठ को, मलकिन की
हारी थकी झुकी हुई दीठ को।

उठ कुण्डी खोल दे
बाहर निकल आ।

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अर्चना वर्मा
जन्म : 6 अप्रैल 1946, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) भाषा : हिंदी विधाएँ : कविता, कहानी, आलोचना मुख्य कृतियाँ कविता संग्रह : कुछ दूर तक, लौटा है विजेता कहानी संग्रह : स्थगित, राजपाट तथा अन्य कहानियाँ आलोचना : निराला के सृजन सीमांत : विहग और मीन, अस्मिता विमर्श का स्त्री-स्वर संपादन : ‘हंस’ में 1986 से लेकर 2008 तक संपादन सहयोग, ‘कथादेश’ के साथ संपादन सहयोग 2008 से, औरत : उत्तरकथा, अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य, देहरि भई बिदेस संपर्क जे. 901, हाई बर्ड, निहो स्कॉटिश गार्डन, अहिंसा खंड-2, इंदिरापुरम, गाजियाबाद