शलभ मैं शापमय वर हूँ!
किसी का दीप निष्ठुर हूँ!

ताज है जलती शिखा
चिनगारियाँ श्रृंगारमाला
ज्वाल अक्षय कोष-सी
अंगार मेरी रंगशाला
नाश में जीवित किसी की साध सुन्दर हूँ!

नयन में रह किन्तु जलती
पुतलियाँ आगार होंगी
प्राण मैं कैसे बसाऊँ
कठिन अग्नि-समाधि होगी
फिर कहाँ पालूँ तुझे मैं मृत्यु-मन्दिर हूँ!

हो रहे झर कर दृगों से
अग्नि-कण भी क्षार शीतल
पिघलते उर से निकल
निश्वास बनते धूम श्यामल
एक ज्वाला के बिना मैं राख का घर हूँ!

कौन आया था न जाना
स्वप्न में मुझको जगाने
याद में उन अँगुलियों के
हैं मुझे पर युग बिताने
रात के उर में दिवस की चाह का शर हूँ!

शून्य मेरा जन्म था
अवसान है मूझको सबेरा
प्राण आकुल के लिए
संगी मिला केवल अँधेरा
मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूँ!

Previous articleजाते-जाते ही मिलेंगे लोग उधर के
Next articleकविता जल रही है
महादेवी वर्मा
महादेवी वर्मा (२६ मार्च १९०७ — ११ सितंबर १९८७) हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से हैं। वे हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाती हैं। आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here