‘Shastri Ji’, a poem by Vipul Barodiya

चौक पर खड़े शास्त्री जी
देख रहे है तकनीक को
फैलते, हॉर्न बजाते, रफ़्तार पकड़ते,
देख रहे हैं धूल को
उनके ऊपर साल भर से जमी,
कबूतर को जो ऊपर आकर नहीं बैठा आज
देख रहे हैं काले अक्षरों में लिखा,
‘जय जवान, जय किसान’,
देख रहे हैं नारे वाले
जंग लगे बोर्ड को,
नजरअंदाज़ कर जाते हुए लोगों को,
चौराहे पर लगे कुछ और पोस्टरों को,
उनमें चमकते चेहरों को,
उनसे बड़े आकार में
हाथ जोड़े खड़े नेताओं को,
कुछ नये लिखे नारों को,
शास्त्री जी देख रहें है
नगर निगम के लोगों को
साफ़ करते फुटपाथ
और याद करते हैं
धूल के जाने का समय
आने ही वाला है,
मालाएँ फिर से पहनायी जाएँगी
और कबूतरों को नहीं बैठने दिया जाएगा
आस पास, पूरे एक दिन,
दो तारीख़ आने वाली है।

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