‘आदिवासी जलियाँवाला एवं अन्य कविताएँ’ से

1

जो ज़मीन से
नहीं जुड़े,
वे ही
ज़मीनों को
ले
उड़े!

2

यह कैसा अद्यतन संस्करण काल का
जिसके पाटे पर क्षत-विक्षत इतिहास
चिता पर जलते आदर्श
जिनके लिए शहीद हुए थे कितने ईसा और सुकरात।

3

भूमण्डलीकरण के रथ पर सवार पूँजी
बाज़ार की ध्वजा
विज्ञापन के बाण
और लक्ष्य आम आदमी के सपने।

4

दुनिया का भला आदमी
रोटी के लिए लड़ता-लड़ता
बन गया सबसे बुरा।

5

हटाते ही पत्थर
उठ खड़ी हुई
कब से दबी घास।

6

बनना मुंसिफ़ सोच-समझकर
हो न कहीं
तू क़ातिल मेरा।

7

बोलने की तो क्या
असल वजह होती है
ना बोलने की।

8

कौन धर्म का फ़र्ज़ निभाने
होते हो अवतरित ईश इस मृत्युलोक में?
हो ईश्वर, ख़ुश रहो स्वर्ग में।

9

ताल्लुक है कोई
भीतर के लावा का
पृथ्वी की हरी-भरी परत से।

10

तलाश रहा मैं
कब से आग वो
राख कर दे दूसरी को जो।

हरिराम मीणा की कविता 'आदिवासी लड़की'

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