क्षणिकाएँ

Poems: Adarsh Bhushan 1 स्त्रियों के जितने पर्यायवाची तुम व्याकरण की किताब में ढूँढते रहे, एक पर्याय तुम्हारे घर के कोने में अश्रुत क्रन्दन और व्यथित महत्त्वाकाँक्षाओं के बीच पड़ा रहा। 2 इस शहर की परतों से डर लगता...

सुधांशु रघुवंशी की कविताएँ

Poems: Sudhanshu Raghuvanshi 1 तुम्हारी हँसी बेआवाज़ थी और रोने में शोर जब तुम प्रेम में थे अब, जब प्रेम तुम में है तुम्हारी हँसी में शोर है रोना.. बेआवाज़! 2 वह शब्द जिसका...

पकने के वक़्त में बहुत कुछ बदल जाता है

Poems: Ekta Nahar सब कुछ सलीक़े से करने वाली उस लड़की ने तय कर रखी थी अपने जाने की तारीख़ भी शादी के इक रोज़ पहले तक मैं बस...

मातृ और मातृभूमि

'Matr aur Matrbhoomi', poems by Harshita Panchariya मेरे लिए मातृ और मातृभूमि में इतना ही अन्तर रहा जितना धर्म और ईश्वर में रहा धर्म मानव बनने का ज़रिया...

प्रेमिल क्षणिकाएँ

Poems: Mukesh Kumar Sinha 1 लिखकर रेत पर नाम तुम्हारा बहा दिया उछलती लहरों में और बस हो गया पूरा समुद्र सिर्फ़ तुम्हारे नाम कहो, दे पायेगा कोई ऐसा उपहार! 2 दीवार से चिपकी थरथरा रही थीं उम्मीदें सपनों की रंगीनियों...

स्मृतियाँ, आग

Poems: Harshita Panchariya स्मृतियाँ देह के संग्रहालय में स्मृतियाँ अभिशाप हैं और यह जानते हुए भी मैं स्मृतियों की शृंखला जोड़ने में लगी हूँ सम्भवतः 'जोड़ने की कोशिश' तुम्हें भुलाने की क़वायद में एकमात्र...

परिभाषा

'Paribhasha', short poems by Namrata 1 सम्भावना एक अमिट दाग़ है निर्बल मन में गहरे धँसी हुई प्रतीक्षा के साइन बोर्ड के साथ। 2 प्रतीक्षा एक वाहक है नैराश्य व आशान्वित के मध्य प्रतिद्वंद्विता के परिणाम की। 3 आशा एक दमनकारी...

क्षणिकाएँ

Short Poems: Harshita Panchariya 'जीवन का सबसे बड़ा भ्रम है स्वयं को जीवित समझना' और 'जीवन का सबसे बड़ा श्रम है स्वयं को जीवित रखना' के अंतर में एक सदी जितनी दूरी...

किसान – पन्द्रह लघु कविताएँ

Poems: Pratap Somvanshi एक एक ऐसा बकरा जिसे पूरा सरकारी अमला काटता खाता सेहत बनाता है और वह दूसरों के लिए चारा उगाता है चारा बन जाता है दो कुनीतियों की डायन अपने ही बच्चे खाती...

क्षणिकाएँ

Short Poems: Harshita Panchariya 1 मंदिरों की घण्टियाँ और मस्जिदों की अज़ान इस बात का प्रमाण हैं कि ईश्वर बहरा है ईश्वर का बहरा होना उसके अंधे होने से ज़्यादा बेहतर है ताकि...

क्षणिकाएँ

नक़्शे भूगोल की कक्षा में अव्वल आई लड़की, बनाती है नक़्शे कई देशों के और उन्हें तवे पर सेक देती है। चाहतें औरत ढूँढ रही है साथ देने वाला आदमी उस समाज में जहाँ आदमी सिर्फ़...

लघु कविताएँ

Poems: Nutan Gupta समय-बोध अश्वारूढ़ होकर चलने का तात्पर्य यह कभी नहीं है कि तुम्हें ठोकर लग ही नहीं सकती, वायु वेग से चलने वाले अश्व भी कभी-कभी धड़ाम हो जाते हैं। अतिरेक मैंने ऐसे...

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Gaurav Bharti

कविताएँ: अक्टूबर 2020

किसी रोज़ किसी रोज़ हाँ, किसी रोज़ मैं वापस आऊँगा ज़रूर अपने मौसम के साथ तुम देखना मुझ पर खिले होंगे फूल उगी होंगी हरी पत्तियाँ लदे होंगे फल मैं सीखकर आऊँगा चिड़ियों की...
Asangghosh

‘अब मैं साँस ले रहा हूँ’ से कविताएँ

'अब मैं साँस ले रहा हूँ' से कविताएँ स्वानुभूति मैं लिखता हूँ आपबीती पर कविता जिसे पढ़ते ही तुम तपाक से कह देते हो कि कविता में कल्पनाओं को कवि ने...
Meena Kumari

चाँद तन्हा है, आसमाँ तन्हा

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा बुझ गई आस, छुप गया तारा थरथराता रहा धुआँ तन्हा ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है...
Bolna Hi Hai - Ravish Kumar

प्रेम की कोई जगह

रवीश कुमार की किताब 'बोलना ही है' से हर कोई इश्क़ में नहीं होता है और न हर किसी में इश्क़ करने का साहस होता...
Woman walking on street

माँ के हिस्से की आधी नींद

माँ भोर में उठती है कि माँ के उठने से भोर होती है ये हम कभी नहीं जान पाए बरामदे के घोंसले में बच्चों संग चहचहाती गौरैया माँ को...
Leaf, Autumn, Plant

अक्टूबर

यह अक्टूबर फिर से बीतने को है साल-दर-साल इस महीने के साथ तुम बीत जाती हो एक बार पूरा बीतकर भी फिर वहीं से शुरू हो जाता है...
Dagh Dehalvi

ले चला जान मेरी

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा सब ने...
Woman doing home chores

एक इन्टरव्यू

मैंने बच्चे को नहलाती खाना पकाती कपड़े धोती औरत से पूछा— 'सुना तुमने पैंतीस साल हो गए देश को आज़ाद हुए?' उसने कहा 'अच्छा'... फिर 'पैंतीस साल' दोहराकर आँगन बुहारने लगी दफ़्तर जाती...
Kailash Gautam

कल से डोरे डाल रहा है

कल से डोरे डाल रहा है फागुन बीच सिवान में, रहना मुश्किल हो जाएगा प्यारे बंद मकान में। भीतर से खिड़कियाँ खुलेंगी बौर आम के महकेंगे, आँच पलाशों पर आएगी सुलगेंगे...
Suresh Jinagal

सुरेश जिनागल की कविताएँ: अक्टूबर 2020

ललेश्वरी बर्फ़ का सीना चीरकर उगे चिनार के नीचे बैठकर आग का कोई गीत गाती स्त्री सदियों की बर्फ़ को पिघला रही है उसकी ज़िद, उसका साहस...
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